Friday, May 15, 2009
किताब के पास जाना, एक स्त्री के पास जाना है
क्या किताब के पास जाना एक स्त्री देह के पास जाने जैसा है। यह बहुत ही रोमांचक और उत्तेजित करने वाला अनुभव है।
स्त्री की तरह ही किताबों में सदियों की करवटें सोयी रहती हैं। एक प्रेमिल निगाह और आत्मीय स्पर्श पाकर वे करवटें अपनी तमाम बेचैनियों के साथ अपना चेहरा आपकी ओर करती हैं। लगभग पत्थर हो चुकी उसकी आंखें आपको एक नाउम्मीदी से टकटकी लगाए देख रही होती हैं। वह विरल व्यक्ति होगा जो स्त्रियों के पास जाते हुए उसकी आत्मा पर पड़ी सदियों की खरोंचों पर धीरे धीरे अपनी अंगुलियां फेरता है और पाता है कि उसकी समूची देह वह प्रेमिल स्पर्श पाकर एक लय में कांप रही है।
उन खरोंचों में मवाद है। वहां सूख चुकी मृत चमड़ी की महिन परतें हैं। लेकिन उसके नीचे अब तक सदियों में मिले असंख्य घाव हैं। वे अब तक ताजा हैं, अपने हरेपन में छिपते हुए। जैसे वे सदियों पुराने नहीं, बस कल रात के ही हों। और उंगली फिराते हुए कोई सूखी चमड़ी की परत उखड़ती है और वहां बिना किसी चीख या आह के घाव उघड़ जाते हैं और रक्त की सहसा उछल आई बूंद में बदल जाते हैं। बस यहीं और यहीं एक देह भी और इस तरह एक किताब भी यह महसूस करती है कि यही है वह स्पर्श जिसने मुझे ऐसे छुआ है कि इसके पहले कभी किसी ने नहीं छुआ था। और उसकी आत्मा के चंद्रमा से सदियों से जो सफेद, महिन बुरादा झर रहा था वह अचानक एक दूधिया उजाले में अपनी पूरी पवित्रता के साथ झिलमिलाने लगता है।
एक देह इसी पवित्रता में अपना कायांतरण इस तरह करती है कि सदियों से चट्टान के नीचे दबे बीज अंगड़ाई लेकर हरेपन के अनंत में अपनी नीली-पीली कोमलता में खुलते-खिलते हुए चमकने लगते हैं।
किताब के पास जाना एक स्त्री के पास जाना है। वह आपके स्पर्श करने के कौशल पर निर्भर करता है कि उसी देह को आप कैसे एक नई देह में बदलते हैं। यदि इस स्पर्श में यांत्रिकता और रोजमर्रा का उतावलापन है तो हो सकता है आप वही देह पाएंगे जो आपको लगभग निर्जीव-सा अनुभव देगी। तब शायद आप उस दुःख के आईने में नहीं झांक पाएंगे जिनमें दुनिया के झिलमिलाते अक्स हैं।
किताब एक स्त्री की आत्मा का घर है
जिसमें देह का रोना सुनाई देता है
रोना एक स्वप्न है
जिसमें बहुत सारी हिचकियां रहती हैं
हिचकियां एक चादर है
जिसके रेशों में दुःख का रंग है
दुःख एक आईना है
आईने में दुनिया के अक्स हैं।
किताब के पास जाना सचमुच एक स्त्री के पास जाना है। वहां अपने अकेलेपन में, अपनी ही धुरी पर घूमती पृथ्वी की आवाज एक आलाप की तरह सुनाई देती है। वहां अमावस्या और पूर्णिमा के बीच एक बेचैन चीख की आवाजाही है जिसका कोई ठोर नहीं। कोई ओर नहीं, कोई छोर नहीं। वह अनंत में अंतहीन है।
जब आप किसी किताब को छूते हैं, वह एक स्त्री को छूने जैसा ही है। आप उसे छूएंगे तो वहां आपको उजाड़ का धूसर और भूरापन भी मिलेगा और बसंत का नीला और पीलापन भी। वहां आपको बारिश की विलंबित लय भी मिलेगी और सूखे का चारों ओर गूंजता सन्नाटा भी। वहां रक्त को जमा देने वाली शीत ऋतु भी मिलेगी तो आपको ग्रीष्म का वह ताप भी मिलेगा जो आपकी आत्मा में पैठ चुकी प्राचीन सीलन को सूखाकर उड़ा देगा।
मैं जब भी अपनी किसी प्रिय किताब को छूता हूं तो लगता है, एक स्त्री को छू रहा हूं। एक स्त्री की तरह किताब भी अपने सारे रहस्य एक बार में नहीं खोलती। पूरे दुःख में, पूरे सुख में, सारी ऋतुओं में, उसे बार-बार छूकर और पढ़कर ही सही अर्थों में हासिल किया जा सकता है। और तब वह अपने रहस्यों के अर्थ खोलती है। धीरे धीरे। एक विलंबित लय में।
एक देह में रूके समय को बहने के लिए और एक किताब में रूके समय को बहने के लिए एक प्रेमिल निगाह और प्रेमिल स्पर्श चाहिए होता है।
इमेज ः
परेश मैती का जलरंग
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17 comments:
बहुत संवेदनशील आलेख और परेश मैती का सुन्दर चित्र. किताबों, शब्दों रंगों से प्रेम करने वाला सच्चा इन्सान ही ऐसा लिख सकता है.
बधाई रवीन्द्र भाई!
sorry par vahi ghisipiti mansikta kae sath stri ko dekhna usae bechra tharana. apka visaya outdated hai.aap kai dasak pichae hain.is beech kaphi kuch badla hai.stri vimarsh ka dayara bada nahi saktae to usae pichae mat la jaiya.
संवेदनशील एवं गहन कलात्मक विवरण प्रस्तुत कर पुस्तक प्रेम बढ़ाने की दिशा में आपने सराहनीय प्रयास किया है.
सुन्दर आलेख हेतु आभार.
बहुत ही सुंदर लिखा आपने...! शब्दातीत प्रशंसा स्वीकार करें।
bahut sundar
वाह क्या उपमा है यही तो है मौलिक सृजनात्मक लेखन !
ek dam hatke ..unchuuaa khayal
anayas hi apni or aakarshit karta hai aapka lekh ..ek nari deh ki tarah.
kaii jagh to bahut sundar aur bechain karne waki kavita hai.
Par kuchh sochne do sandhya ke gusse par...
वाह क्या तुलनात्मक उपमा है। बहुत संवेदनशील आलेख।
बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने। आपकी इस पोस्ट से अपनी एक पोस्ट याद आ गई।
वाकई। जैसे-जैसे किताब के पन्ने हम पलटते जाते हैं हमारी उत्तेजना और बढती जाती है। रोचकता से भरपूर पोस्ट। बधाई।
माफ कीजियेगा रवीन्द्र जी, लेकिन स्त्रियां किताब नहीं हैं. किताबों को जब चाहे हाथ लगा सकते हैं अपनी सुविधा से आप उनके संसार में प्रवेश करते हैं लेकिन स्त्रियों का संसार ऐसा नहीं है. अभी और समझना होगा स्त्रियों को. कौशल काफी नहीं. वो अपनों जख़्मों से ही प्यार कर लेगी. आपको आने नहीं देगी. किताब की तरह कभी भी उसे छुआ नहीं जा सकता. हां, एक बात सच है कि स्त्रियों को समझना आसान नहीं है. लेकिन कोशिश अच्छी है.
इस पोस्ट को पढ़कर मुझे अपने कानों से सुनी किताबों की खुसर-फुसर याद आ गयी। इतना तो मानना ही पड़ेगा कि किताबों में एक जिन्दा इन्सान का दिल धड़कता है। अब उस इन्सान को हम किस रूप में पहचान पाते हैं यह हमारी सम्वेदना पर निर्भर करता है।
अच्छा लिखा है आपने।
आपने तो बड़े संशय में डाल दिया क्योकि हम तो स्त्री नाम से चार कदम का फासला रखते हैं
और किताब को सीने से लगा कर सोते है
वीनस केसरी
आपके लेख की चर्चा सुजाताजी ने यहां की है और लिखा है-जब जब हम स्त्रीके साथ इस रहस्य को जोड़ते हैं तो हमारे किशोर इस मूल्य के साथ बड़े होते हैं कि स्त्री रहस्य है इसलिए उससे डील करना आसान नही है। इसलिए वे उसके पास जाने से पहले अपने अस्त्र शस्त्र और योजनाएँ बना कर जाते हैं।मुक्त हो कर सहज भाव से नही।यदि आपको बताया जाए कि आप किसी तिलिस्म के दरवाज़े पर खड़े हैं तो स्वाभाविक ही होगा कि आपकी मन:स्थिति जूझने , लड़ने, विजयी होने , जीतने या भय के कारण उतपन्न असुरक्षा और अभिमान की होगी।एक ग्रंथि ! एक ऐसी ग्रंथि जो इस दुनिया मे स्त्री को कभी पुरुष के लिए और पुरुष को स्त्री के लिए सहज नही होने देती।संभव हो तो सुजाता जी ने जो मुद्दे उठायें हैं उन पर अपने विचार व्यक्त करें।
sabhi ka shukriya!
एक स्त्री और पुस्तक का साम्य वाकई हृदय को छू लेने वाला है
अच्छी रचना के लिए आभार....
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