Wednesday, May 20, 2009

पत्ता-पत्ता, जीवन का हर राग गाता रफ्ता-रफ्ता




वहां कैनवास पर पत्ते ही पत्ते हैं। झरते हुए, कभी एक साथ और कभी छितराए हुए। हरे-पीले, नारंगी-नीले, काले-भूरे। उजाले में आकर नाचते हुए, उदास हो कर अंधेरे में डूबते हुए। लगता है जैसे हरे-पीले पत्ते जीवन का राग गाते हुए स्वागत कर रहे हों, नारंगी-नीले वसंत के हर्ष में नाच रहे हों। काले-भूरे जैसे बिछड़ने के दुःख में, विषाद में विलाप कर रहे हों। ध्यान से देखो तो लगेगा ये कैनवास से निकलकर आपको घेर लेते हैं और अपने उड़ने में, भटकाव में, एक लय में जीवन के गहरे आशय बता रहे हों। जैसे कह रहे हों यही जीवन है जिसमें उत्साह के साथ निराशा है, दुख के साथ सुख है और अंततः वसंत के साथ पतझर भी है। जाहिर है ये कैनवास जीवन के स्वागत के, बिछोह के और हर स्पंदन के रूप हैं, प्रतीक हैं। रफ्ता-रफ्ता जीवन के हर राग को गाते हुए।
ये नए कैनवास रचे हैं इंदौर के युवा चित्रकार राजीव वायंगणकर ने। उनके इन चित्रों की एकल नुमाइश मुंबई के आर्टिस्ट सेंटर में 25 से 31 मई को लगने जा रही है। इसमें वे 30 नए चित्रों को प्रदर्शित करेंगे। उन्होंने इसका शीर्षक दिया है- पत्ता पत्ता।
उनके घर पर ताजा चित्रों को देखते हुए महसूस हुआ कि ये चित्र गहरे दार्शनिक आशयों के चित्र हैं। इन पत्तों में जीवन का मर्म प्रकट हो रहा है। लेकिन इन पत्तों को रचने में राजीव की कोई हड़बड़ाहट नहीं देखी जा सकती बल्कि एक इत्मीनान है, धीरज है। जैसे वे जीवन के आशयों को जानकर उन्हें अनुकूल रूपाकारों में ढाल रहे हैं। इसलिए उनके पत्तों में स्पंदन है, कम्पन्न है। वे एक सोची समझी रंग योजना में इस तरह प्रकट होते हैं कि अपने साथ उन आशयों को लपेटे हुए लिए आते हैं जिन्हें चित्रकार अभिव्यक्त करना चाहता है। इसीलिए राजीव कहते हैं कि इससे पहले मैं अपने को टुकड़ों में अभिव्यक्त कर रहा था अब लगता है मैंने अपने आपको सही दिशा और सही भाव भूमि पर अभिव्यक्त किया है। मैं अब इस जीवन-जगत को, इसके रहस्यों और आशयों को गहराई से समझ रहा हूं।
राजीव अपने कैनवास पर प्रकाश और छाया का सुंदर खेल रचते हैं। उनके इस हलके-गहरे प्रकाश में पत्ते अपने आकारों में रूपायित होकर कभी उजाले में पास आते लगते हैं तो गहरे रंगों में दूर जाते हुए तिरोहित होते लगते हैं। लेकिन इसके पहले उनकी थरथराहट कैनवास पर छूट जाती है और इस तरह उड़ते और दूर जाते हुए पत्ते कैनवास को अपने आशयों से अर्थवान बना देते हैं। इसी से कैनवास धड़कने लगता है। कहने की जरूरत नहीं कि पत्ते पृथ्वी की जीवंतता है। उनमें जीवन के उत्सव-उल्लास के रंग हैं लेकिन मृत्यु निश्चित है इसलिए राजीव इन उत्सव मनाते पत्तों के बीच कहीं कही मृत्यु के प्रतीक काले-भूरे पत्तों को सायास और सावधानीपूर्वक रचते हैं। इस जीवन और मृत्यु के बीच ही उनके पत्ते उड़ते रहते हैं और आपकी स्मृति में गिरते हैं। वे आपको छूते हैं. आपको घेरते हैं, और बिना आवाज किए चुपचाप आपको जीवन का मर्म समझा जाते हैं। हालांकि राजीव बिल्व पत्र की महिमा बताते हुए इन कैनवास पर एक ही श्लोक लिखते हैं जिसका अर्थ यह है कि इस पत्ते को शिव को अर्पित करने से तीन जन्मों के पापों से मुक्त हुआ जा सकता है। वे श्लोक को अपने हर कैनवास पर इस तरह से लिखते हैं कि वह भी पेंटिंग का अभिन्न हिस्सा हो जाता है , उसकी लय में लय मिलाता अपनी सार्थकता हासिल करता है।
राजीव ने पत्तों को इतनी संवेदनशीलता से रचा है कि उनकी बनावट और टोनल इफेक्ट आकर्षित करते हैं। फिर वे टेक्स्चर को लेकर काम करते हैं, रंगों की पतली गहरी सतहें बनाते हैं, और इस तरह से आंखों की संवेदना को जगाते हैं। रंगों के साथ उनका बरताव चैनदारी और कल्पनाशीलता का है। इस तरह वे कभी शाम, कभी सुबह, कभी अंधेरे, कभी उजाले में झरते पत्तों को चित्रित करने मे कामयाब हुए हैं। टेक्स्चर उनका अलंकार है। इससे वे कैनवास को सजाते हैं। ये कैनवास पत्ता टूटा डाली से पवन ले गई उडा़व जैसी काव्य पंक्ति के रूप हैं। जीवन चक्र को ज्यादा कल्पनाशील ढंग से अभिव्यक्त करते हुए। राजीव के इन कैनवास को देखना जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव और रहस्यों को देखना-समझना है। इसमें जीवन के कई मूड्स हैं।

6 comments:

कुलवंत हैप्पी said...

अच्छी खबर है. बधाई हो चित्रकारों को

कुलवंत हैप्पी said...
This comment has been removed by the author.
somadri said...

सच जिंदगी एक केनवास ही तो है, यहाँ किस तरह पल-पल में रंग बदलते है हमारी संवेदनाएं

Ashok Pande said...

रवीन्द्र भाई

आम हिन्दुस्तानी जिसके लिए पेन्टिंग का मतलब मोटे तौर पर फ़क़त हुसैन का घोड़ा भर रहा हो, उस के लिए आप का यह ब्लॉग एक ऐसी पाठशाला बनता जा रहा है जो अपने आप में अनूठी और अद्वितीय है. हां अपरिहार्य भी.

कितने कितने युवा कलाकारों से परिचय कराते हैं आप हम सब का - यह उत्साहित करने वाला भी है और बौद्धिक रूप से समृद्ध करने वाला भी.

आपके आलेख बहुत प्रभावी होते हैं.

नज़र न लगे.

यह मैं कई दिनों से कहना चाह रहा था. आज की पोस्ट देख कर तुरन्त लिख देने को मन हुआ.

बधाई! और हमेशा की तरह धन्यवाद.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

अशोक भाई की बातों से पूरी तरह सहमत.

अनुपम अग्रवाल said...

जिन्दगी की रंगीनी सामने लाती हुई रचना