Monday, May 18, 2009

जिसके कंधे पर सिर रखकर रो सकें


किताबों पर लिखी जा रही श्रृंखला की दूसरी कड़ी

वह कुर्सी अब भी है। उसका एक हत्था ढीला हो चुका है। उसका रंग उड़ चुका है। अब वह ज्यादा कत्थई-भूरी दिखती है। वह सागौन की अच्छी लकड़ी से बनी कुर्सी है। सुबह की गुनगुनी धूप में या किसी ठिठुरती रात में हमारे घर की जर्जर पीली रोशनी में पिता इसी कुर्सी पर बैठकर अपनी मनपसंद किताबें पढ़ते रहते।
कभी गीता या रामचरित मानस का कोई गुटका, प्रेमचंद का गोदान या निर्मला, दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय या फिर मुक्तिबोध का चाँद का मुँह टेढ़ा है। वे मराठी बहुत अच्छी बोलते थे और मराठी नाटकों में उन्होंने कई भूमिकाएँ अदा कीं।
वे मराठी साहित्य प्रेमी भी थे। मुझे उनसे जो लकड़ी की हरी पेटी मिली थी, उसमें इन बहुत सारी किताबों के साथ ही मराठी के नाटककार रामगणेश गडकरी के नाटक भी थे।
मैं अक्सर उन्हें उन किताबों में डूबा देखता था और सोचता था कि आखिर किताबों में ऐसा क्या है। एक दिन ऐसा नहीं जाता कि पिता किसी किताब को लिए बैठे न हों।
जैसे अपने जीवन में सब लोग अपने प्रिय जनों को हमेशा हमेशा के लिए खो देते हैं, ठीक उसी तरह मेरे पिता ने भी अपने प्रियजनों को बारी-बारी से खोया। जैसे कि मैंने उन्हें खो दिया। हमेशा के लिए। पिता के जाने के बाद मैंने माँ को पढ़ते हुए देखा। अब मैंने अपनी माँ को भी खो दिया है।
मैं भी किताबें पढ़ता हूँ और मुझे किताबें पढ़ता हुआ देख मेरा बेटा मुझे देखता है।
पहले पिता के पास किताबों को रखने के लिए कोई रैक नहीं थी। वे अपनी किताबें एक लकड़ी की पेटी में रखते थे।

फिर मैंने किताबें खरीदना शुरू कीं तो उन्हें सस्ती लकड़ी के एक रैक में रखता था। अब नए घर में दो-तीन आलमारियाँ हैं जिनमें मेरी किताबें भरी हैं। इनमें वे किताबें भी हैं जो मेरे पिता से मुझे मिली थीं।

मैं उन घरों में जाकर सिहर जाता हूँ जहाँ किताबों के लिए कोई कोना नहीं देखता ।
हमारे घर गोदामों में तब्दील हो चुके हैं। उनमें सुख-सुविधा के तमाम साधन हैं लेकिन कई घरों में देखता हूँ कि वहाँ किताबों के लिए कोई कोना नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि मैं अपने पिता की वह कुर्सी हमेशा-हमेशा के लिए सड़ने से बचा लूँ जिस पर बैठकर वे किताबें पढ़ते थे। मैं चाहता हूँ मेरे बाद मेरा बेटा यह कुर्सी हमेशा-हमेशा के लिए बचा ले ताकि वह इस पर बैठकर कोई किताब पढ़ सके। और मेरे जाने से जो खालीपन उसके जीवन में पैदा होगा वह किताबों की खूबसूरत दुनिया से थोड़ा भर ले।
जैसे मैं अपने माता-पिता के जाने के बाद पैदा हुआ खालीपन किताबों से भरने की कोशिश करता हूँ।

युवा कहानीकार जयशंकर ने कितनी मार्मिक बात कही है-मुझे लगता रहा था कि अपने प्रियजनों के चले जाने के बाद जैसा खालीपन जीवन में उतरता चला जाता है, उसे किताबों से भी थोड़ा बहुत भरा जा सकता है। वहाँ किताबें हमारे आत्मीयजनों में बदल जाती हैं। वे हमारी मित्र हो जाती हैं और अपने कन्धों पर हमारा सर रख लेती हैं कि हम कुछ देर तसल्ली के साथ रो सकें। सांत्वना पा सकें। अपने जीने को सह सकें, अपने जीवन को समझ सकें।
मैं चाहता हूँ हर घर में कोई ऐसी किताब हो जिसके कंधे पर हम अपना सिर रखकर रो सकें। सांत्वना पा सकें। अपने जीने को सह सकें, अपने जीवन को समझ सकें।

7 comments:

Ek ziddi dhun said...

behad apni si baat Ravindra bhai.

pratibha said...

रवीन्द्र जी किताबों पर मेरा भी एक नोट मेरे ब्लॉग पर है. आपकी श्रृंखला से प्रेरित होकर ही शायद. हालांकि लिखा काफी पहले था.

कुलवंत हैप्पी said...

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति है..पढ़कर बहुत सकून मिला.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

bahut umda////
sabjectiv lekhan ka maarmik andaaz/ pasand aayaa/

sidheshwer said...

किताबों की दुनिया की संवेदनशील सैर..
बहुत बढ़िया!

Harkirat Haqeer said...

मैं उन घरों में जाकर सिहर जाता हूँ जहाँ किताबों के लिए कोई कोना नहीं देखता ।

मैं चाहता हूँ हर घर में कोई ऐसी किताब हो जिसके कंधे पर हम अपना सिर रखकर रो सकें। सांत्वना पा सकें। अपने जीने को सह सकें, अपने जीवन को समझ सकें।

रविन्द्र जी आपके विचार सराहनीय हैं ...सच में जिस घर पुस्तकों के लिए जगह नहीं वहां माँ सरस्वती का निवास नहीं होता ....और फिर पुस्तकें तो सबसे अच्छा मित्र होती हैं.....!!

अनुपम अग्रवाल said...

ज़िन्दगी तो खुद ही एक किताब है.

प्रेरणा देती हुई रचना