Tuesday, June 2, 2009

मेरे अरमानों की कसक नीली है


उसे शिकायत है कि मैंने अभी तक उसकी कोई सुंदर और सीधी तस्वीर नहीं उतारी, मेरी मजबूरी है कि मैं सुंदर और सीधी तस्वीर उतार ही नहीं सकता। उसका कहना है कि जिसे मैं मजबूरी कहता हूँ वह दरअसल मेरी कल्पना का विकार है, मेरा कयास है कि जिसे वह मेरी कल्पना का विकार कहती है वही शायद मेरी कल्पना की जान हो। फिर भी मैं खुद इस ख्वाहिश की कैद में रहता हूँ कि एक बार उसके रूप की एक सरस और सुंदर तसवीर उतार कर उसे पेश कर दूँ और उसकी आँखों के नीले उजाले की बहार देखूँ। इसी ख्वाहिश ने ही शायद मुझे इस ऊँचाई पर ला बिठाया है।

ऊँचाई से आगाह इसी क्षण हुआ हूँ। देखता हूँ कि दोनों चपटी चट्टानें एक गहरी वादी के ऊपर कहीं टिकी झूल रही हैं। और उनके साथ साथ मैं भी। वादी में झाँकने से डरता हूँ। इस डर का रंग भी नीला है। इस पर पत्थर रखकर वादी में झाँकता हूँ तो महसस होता है उसकी आँखों में झाँक लिया हो। दो झिलमिलाती झीलों में पड़े दो नीले पत्थर मेरी निगाहों को रोक कर नाकार कर देते हैं। मैं कई बार उससे उन पत्थरों की बात कर चुका हूँ। वह हर बार एक ही जवाब देती है। मैं चुप और अकेला हो जाता हूँ, जैसे मुझे किसी ने नीले कोने में जा खड़ा होने का आदेश दे दिया गया हो।

इस याद की रोशनी में कोरे कागज को दबाए बैठे गोल पत्थर की नीली धड़कन पर उसके दिल की धड़कन का गुमान होता है। मैं बरसों से इस धड़कन की भाषा को समझने की नाकाम कोशिश कर रहा हूँ। अगर अभी तक उसका दिल, उसकी आँखें, उसकी समूची देह एक ऐसी सीमा बनी हुई है जिससे उधर और अंदर के आलम की मुझे सही सही खबर तक नहीं, तो क्या सबूत है कि मुझे किसी भी देह के उधर और अंदर के आलम की कोई खबर है? कोई सबूत नहीं। इस हार का रंग भी नीला है। कागज को दबाए हुए गोल पत्थर की धड़कती हुई नालाहट आँखों को आराम भी दे रही है, अशांति भी। आराम में ठंडक है, अशांति में ठिठुरन।

नीला रंग मुझे प्रिय है। मेरे अंधेरे का रंग नीला है। मेरे अरमानों का कसक नीली है। आकाश जब निर्दोष हो तो उसका रंग भी नीला होता है। उसकी आँखें नीली न होती हुई भी नीली हैं। हर दर्द का रंग नीला होता है। नसें नीली होती हैं। अंत का उजाला नीला होता है। जख्म के इर्दगिर्द कई बार एक नीला हाला सा बन जाता है। हब्शियों के संगीत का रंगी नीला है। मेरे खून में जो तृष्णा दौड़ती रहती है, उसका रंग नीला है। स्मृति का रंग नीला है। मिरियम का प्रिय रंग नीला था। भूख का भय नीला होता है। कृष्ण का रंग नीला है।

मेरी आँखों के नीचे पड़े फड़फडा़ते इस कागज के कोरेपन में भी नीलाहट की अनेक संभावनाएँ छिपी बैठी हैं जिसकी प्रतीक्षा में ही शायद मैं इस पर किसी बुत या बाघ की तरह झुका हुआ हूँ।
(ख्यात उपन्यासकार-कहानीकार कृष्ण बलदेव वैद के उपन्यास काला कोलाज का एक अंश। अंश का शीर्षक मैंने दिया है)
(पेंटिंगः रवीन्द्र व्यास)

Monday, June 1, 2009

शब्द का संग छूटा तो रंगों ने थाम लिया


वे कविता लिखती हैं लेकिन मन इन दिनों पेंटिंग्स में रमा हुआ है। शब्द का संग छूटता लग रहा है। ऐसे में रंगों ने उनका हाथ थाम लिया है। वे उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां अकसर लोग थककर खामोश हो जाते हैं लेकिन वे रंगों के साथ हमकदम हैं। बिना थके, बिना रूके वे लगातार चित्र बना रही हैं। ये हैं कवयित्री और चित्रकार चम्पा वैद। वे 78 पार हैं लेकिन रंगों में उनकी रचनात्मकता का यौवन झलकता है। हैरतअंगेज यह है कि 77 की उम्र में उन्होंने पेंटिंग्स बनाना शुरू किया। वे अपने 21 चित्रों के साथ पिछले दिनों देवलालीकर कला वीथिका, इंदौर में कला और कविता प्रेमियों से रूबरू थीं। उन्होंने अपनी कविताएं भी पढीं। फ्रांस आलियांस और फाइन आर्ट कॉलेज का यह मिला जुला कार्यक्रम था।
77 उम्र में चित्रकारी करने के सवाल पर श्रीमती वैद कहती हैं-मुझे खुद नहीं पता कि यह चमत्कार कैसे घटित हुआ। मैं बीमार थी और कविता भी नहीं लिख पा रही थी। बेचैनी थी। एक दिन अचानक पेंसिल उठाई और चित्र बनाया। वह बन गया। बस कहीं से सोता फूट निकला और मैं बहती चली गई। फिर एकाएक रंग आ गए, कागज आ गए, हाथों ने कलम की जगह कूची थाम ली। और इस तरह चित्र बनते चले गए। ऐसा लगा कि मन के भीतर कहीं बहुत गहरे कुछ भरा पड़ा था, रूका पड़ा था। दिन थोड़े बचे हैं और बहुत सारा अभिव्यक्त करना है। तो जो भीतर भरा पड़ा था, उसे एकाएक रास्ता मिल गया, रंगों के जरिये, आकारों के जरिये।
इसके बाद वे रूकी नहीं और यही कारण है कि उनके चित्रों की दो समूह प्रदर्शनियां हो चुकी हैं और यह दूसरी एकल प्रदर्शनी थी-स्क्रिप्ट्स। उनकी तीसरी एकल नुमाइश डान आफ द डस्क शीर्षक से तीन जून से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित है जिनमें उनके 25 काम प्रदर्शित होंगे। उनके इन चित्रों का चयन किया है कला समीक्षक वर्षा दास और पत्रकार अोम थानवी ने। इंदौर की देवलालीकर कला वीथिका में उनके कैनवास और पेपर पर एक्रिलिक से बने चित्र हुए। वे कहती हैं कि मुझे पेंटिंग्स से गहरा लगाव था लेकिन सोचा नहीं था कि चित्र भी बनाने लगूंगी। महसूस होता है जैसी सरस्वती ही यह सब संभव कर रही हैं। अपर्णा कौर, माधवी पारेख और अर्पिता सिंह की चित्रकारी को पसंद करने वाली श्रीमती वैद कहती हैं कि मैं खुश हूं कि मेरे सपनों में रंग और इमेजेस आते हैं और मैं चित्र बना रही हूं लगातार। खुशी यह भी है कि कला प्रेमी और कला पारखी कहते हैं कि इन पर किसी का प्रभाव भी नहीं। लेकिन दुःख इस बात का है कि शब्दों का साथ छूटता जा रहा है। मैं कविता नहीं लिख पा रही। लिखती भी हूं तो वह रचनात्मक संतोष नहीं मिलता जो रंगों के साथ होने से मिल रहा है। मैं जिस इंटेसिटी से कविताएं लिखती थी वह अब नहीं हो रहा है। अब तो मन रंगों में डूबा है।

Thursday, May 28, 2009

रोज घर से निकलो, रोज घर पहुंच जाओ बच्चो !


यह एक छोटा-सा अनुभव है, जो मैं आपको बताने जा रहा हूं लेकिन इसके पीछे जो दहशत है वह शायद कई सालों की है। और मुझे लगता है शायद मेरी मां इस दहशत से रोज-ब-रोज गुजरती थी।
मेरे बेटे मनस्वी, जिसे हम मनु कहते हैं, ने जिद की कि वह अब साइकिल से स्कूल जाएगा। अब तक वह अॉटो से जाया करता था।
मैं जब भी घर से निकलता हूं तो मां मुझे ऐसे देखती है कि अब मैं कभी वापस घर नहीं लौटूंगा। शहर में न दंगा-फसाद हुआ है और न ही कोई भूकंप आया हुआ है। न बाढ़ आई है और न ही कोई आगजनी हुई है। फिर भी जब मैं घर से निकलता हूं तो मां मुझे ऐसे देखती है कि मैं अब वापस घर नहीं लौटूंगा। घर से निकलते हुए मैं अपनी पीठ के पीछे मां के धम्म से बैठने की आवाज सुनता हूं।
जब मां को पता लगा कि उनका पोता साइकिल से स्कूल जाएगा तो उसने साफ इनकार कर दिया कि नहीं, वह आटो से ही जाएगा भले ही इसके लिए उसे अपनी पेंशन से पैसे देना पड़ें।
तो मंगलवार यानी छह मई को मनु साइकिल से स्कूल के लिए सुबह ठीक छह बजकर 55 मिनट पर घर से निकल गया। पता नहीं मैं किस दहशत में था, चुपचाप अपनी बाइक से बेटे के पीछे-पीछे चलने लगा। उसका स्कूल, घर से लगभग पांच-छह किलोमीटर दूर है। स्कूल के पास पहुंचने पर बेटे की साइकिल की चेन उतर गई। मैंने अपनी बाइक रोकी और उसकी चेन चढ़ाई और स्कूल तक उसके साथ-साथ गया। उसने मुझे अपने पीछे आते हुए देख लिया था । उसने मुझसे कुछ कहा नहीं, लेकिन उसका चेहरा बता रहा था कि इस तरह मेरा उसके पीछे-पीछे आना नागवार गुजरा है।
ठीक एक बजकर 15 मिनट पर मनु के स्कूल की छुट्टी हो जाती है। 12 बजकर 50 मिनट पर मेरे आफिस में पत्नी का फोन आता है। मैं अपने बेटे के साथ आने के लिए स्कूल रवाना हो जाता हूं और धीरे-धीरे उसके साथ घर लौटता हूं।
घर से स्कूल के रास्ते में तीन चौराहे पड़ते हैं और इनमें से इंदौर के दो चौराहों बाम्बे हॉस्पिटल और सत्य सांई स्कूल वाले चौराहे पर जबरदस्त ट्रेफिक होता है। इंदौर के अखबारों में रोज ही, कहीं न कहीं, सड़क दुर्घटना की खबरें छपती रहती हैं जिनमें बच्चे और युवा असमय मारे जाते हैं। और कौन सा ऐसा अखबार होगा जिनमें इस तरह की खबरें नहीं छप रही होंगी।
दूसरे दिन यानी सात मई को मनु ने जिद की कि मैं उसके पीछे न आऊं। मैं नहीं गया। वह सुबह ठीक छह बजकर 55 मिनट पर निकल गया। मैं साढ़े दस बजे अपने आफिस आ गया। कामकाज के बीच में रह=रह कर मैं एक दहशत में भर जाता था। समय जैसे धीरे-धीरे रेंग रहा हो। मैंने नोट किया था कि मनु को स्कूल से घर पहुंचने में कम से कम पच्चीस मिनट लगते हैं। मैंने एक बजकर चालीस मिनट पर घर फोन किया। पहली घंटी गई तो मैंने महसूस किया कि मेरी धड़कन सामान्य से कुछ तेज है। फिर दूसरी और तीसरी घंटी गई। मेरी धड़कन अचानक तेज हो गई थी। कितनी सारी काली खबरें दिमाग में शोर मचाने लगीं। कई तरह की आशंकाओं ने एकाएक घेर लिया। चौथी घंटी पर उधर मां की आवाज थी। उसकी दादी ने बताया मनु घर आ चुका है।
दोस्तो, मैं नहीं जानता ईश्वर है कि नहीं, लेकिन मैं हमेशा प्रार्थना करता रहूंगा उन तमाम बच्चों के लिए जो किसी भी काम से, किसी भी कारण अपने घर से निकलते हैं कि वे वापस अपने घर लौट आएं।
मैं अपनी मां को याद करता हूं जो मेरे घर से निकलने पर मुझे ऐसे देखती थी कि मैं अब कभी घर वापस नहीं लौटूंगा।
घर लौटो बच्चो,, घर लौट जाओ!!

इमेजः

स्पेन के मशहूर चित्रकार डिएगो रिवेरा की पेंटिंग

Saturday, May 23, 2009

आंगन नहीं, धूप नहीं, खिलखिलाने की आवाजें नहीं


हमारे घर में आंगन था।
आंगन में धूप आती थी। सूरज दिखाई देता था।
अब घर के ठीक सामने तीन-चार बिल्डिंगें बन जाने से सूरज बारह बजे के पहले दिखाई ही नहीं देता। अब धूप की जगह आंगन में बिल्डिंग की परछाइयां दिखाई देती हैं।
पहले पिता सूर्य नमस्कार करते थे, अब करते तो लगता बिल्डिंगों को नमस्कार कर रहे हैं।
मां पहले मूंग की बड़ी और कई तरह के पापड़ बनाया करती थीं लेकिन अब बड़ी और पापड़ सुखाने के लिए आंगन में धूप नहीं आती।
भाभी या जीजी सिर से नहाती तो बाल सुखाने आंगन में आ जाया करती थीं।
अब न धूप आती है, न भाभी और जीजी बाल सुखाने इस आंगन में दिखाई देती हैं।
पूरे मोहल्ले में हमारा ही घर ऐसा था जिसमें आंगन था। मोहल्ले में धीरे-धीरे पुराने मकान टूट रहे थे, नए बनते जा रहे थे। उनके आंगन गायब हो गए। ज्यादा कमरे बनने से आंगन सिमटते जा रहे थे। अधिकांश घरों में प्यारा-सा छोटा-सा आंगन तक नहीं दिखाई देता। आंगनों में जो कमरे बन गए थे, उनमें एक ही परिवार के लोग अलग अलग रहने लगे थे। उन सब की अलग अलग दुनिया थी। उनके फ्रीज अलग थे, उनके टीवी अलग थे, उनकी कुर्सियां और सोफे अलग थे।
हमारे घर में जो आंगन था, वहां धूप आती तो घर के सारे लोग धूप सेंकते। पिता अपनी कुर्सी पर चाय की चुस्कियां लेते अखबार पढ़ते। फिर सरसों के तेल की मालिश करते। मैं अकसर सरसों के तेल से पिता के हाथ-पैरों की मालिश करता। फिर वे हमारे हाथ पैरों पर तेल लगा कर हलके हाथ से मालिश करते। कहते मालिश करा करो, बदन बनाओ। मां कपड़े सुखाती या पापड़ और बड़ी। उसी आंगन में हम सब बैठकर बासी रोटी से बना पुस्कारा खाते (रोटी को चूरकर हरी मिर्च -प्याज से बघार कर )।
पिता को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि वे बाहरी के कमरे में प्लग लगाकर एक लंबे वायर को आंगन तक ले आते और लैम्प जलाकर पढ़ते।
उस आंगन में पास खड़े पीपल और नीम के पेड़ से पिपलियां और निम्बोलियां गिरती रहती थी। हम इन पिपलियों को खाते थे। वे मीठी लगती थीं। उनका स्वाद हम अब तक भूले नहीं हैं। बसंत में हम कोयल की कूक सुनते। उसकी नकल करते। कई पक्षियों का कलरव सुनते। उन्हें उड़ते और बैठते देखते। शाम को लौटते देखते। हमारे आंगन में, हमारी कुर्सियों, हमारे कपड़ों पर बीट गिरती। हमारे आंगने में उनके पंख गिरते। हम हथेलियों में ले उन्हें उडा़ते। वे इतने हल्के, इतने कोमल होते की जरा सी फूंक से हवा में लहराने लगते। सुबह की कोमल धूप में वे पंख और कोमल दिखाई देते। सफेद, चमकीले। गर्मियों की शाम हमारे बिस्तर आंगन में लगते। हम तारों भरी रातों को निहारते सोते थे। मां हमें तारे बताती। खूब चमकीला तारा बताती। वे हमें तारों से बनी आकृतियां बताती- कभी धनुष, कभी हल। हम घटते-बढ़ते चंद्रमा को देखते। हम दूज का, तीज का और पूर्णिमा का चंद्रमा निहारते। बड़ी बहनें हमें कभी लोरियां और कभी कहानियां सुनाया करती थीं। कई बार पड़ोस के बच्चे हमारे साथ आकर मां से कहानियां सुनते। सुनते- सुनते हमारे साथ ही सो जाते। उनकी माएं उन्हें कभी ढ़ूंढ़ने नहीं आती। उन्हें पता होता कि वे हमारे साथ ही सोये होंगे।
आंगन में छोटे छोटे पौधे थे। गेंदा, चमेली, नींबू, केले। बहने उन्हें बराबर पानी देती। वे कभी सूखे नहीं। मुरझाए नहीं। कभी कभी आंगन में लाल-काली चीटियां हो जातीं। लाल चीटियों के काटने से हमें ददोड़े (लाल चकत्ते) हो जाते। मैं आटा डालती।
बहनें फुगड़ियां खेलती, लंगड़ी खेलतीं, पांचे खेलती। हम सब के खिलखिलाने से यह आंगन गूंजता था। मां हमारी इस खिलखिलाहट में शामिल होती थी। पिता यह सब देखते हुए मुदित रहते। उनका एक भरा-पूरा परिवार था। हंसता-गाता संसार था। हम उनके पंछी थे, हमारी चहचहाहट से उनका आंगन गूंजता था।
हमारा आंगन बहुत बड़ा था। सामान बहुत कम था। हमारे खेलने के लिए खूब जगह थी। हम गिरते तो घुटने छिल जाते थे। बहने गोद में उठा लिया करती थीं। मां हल्दी का फोहा लगाती। रात में हल्दी के साथ ही गरम दूध पिलाती। पिता चुपचाप अपने सीने से लगाए हमें थपकियां देते सुला लेते थे।
उस आंगन में हमें हमारे जीवन की सबसे मीठी नींद आती थीं।
अब न मां है, न पिता। कभी बहनें आती हैं, कभी -कभार भाभियां-काकियां भी आती हैं। बच्चे भी हैं। उनके दोस्त भी हैं। सुख-सुविधाओं का सामान भी है।
बस आंगन नहीं है, धूप नहीं है, धूप में बैठकर सबके खिलखिलाने की आवाजें नहीं हैं।

Friday, May 22, 2009

जिन्हें तुम धन्यवाद देना चाहते हो

कुमार अंबुज की कविता

न वह पेड़ बचता है और न वैसी रात फिर आती है
न ओंठ रहते हैं और न पंखुरियां
रूपकों और उपमाओं के अर्थ ध्वनित नहीं हो सकते
बारिश जा चुकी है और ये सर्दियां हैं जिनसे सामना है

जीवन में रोज ऐसा होता है कि कृतज्ञता ज्ञापित
कर सकने के क्षण में हम सिर्फ अचंभित रह जाते हैं
और फिर वक्त निकल जाता है

बाद में जिन्हें तुम धन्यवाद देना चाहते हो
तो पाते हो कि वे आदमी और जगहें ध्वस्त हो चुकी हैं
या इतनी बदल गई हैं कि उन्हें धन्यवाद देना
किसी अजनबी से कुछ कहना होगा

लेकिन इससे हमारे भीतर बसा आभार
और उसका वजन कम नहीं हो जाता
एक निगाह, एक हाथ और एक शब्द ने
यहां तक जीवित चले आने में हर एक की मदद की है
और इतने अचरज हमारे साथ हैं कि दुनिया में स्वाद है

धन्यवाद न दे सकने की कसक भी चली आती है
जो किसी मौसम में या टूटी नींद में घेर लेती है
जिन्हें तुम धन्यवाद देना चाहते हो
कई बार उन्हें खोजना भी मुश्किल है
और जो सामने हैं उनके बरक्स तुम
फिर अचकचाए या सकुचाए खड़े रहते हो

हालांकि कई चीजें तुम्हारी भाषा नहीं समझतीं
पतझड़, झरने, चाय की दुकान और अस्पताल की बेंच
लेकिन उनसे तुम्हारा बर्ताव ही बताएगा कि तुम
आखिर क्या चाहते हो

शायद इसलिए ही कभी सोच-समझकर या अनायास ही
लोग उनके कंधों पर सिर रख देते हैं


(नईदुनिया दिल्ली के साथ प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका संडे नईदुनिया के 17 मई के अंक में प्रकाशित कविता)

Thursday, May 21, 2009

रात, चंद्रमा, स्त्री और एक किताब ने बचा लिया


दुनिया में हमेशा से कुछ ऐसी चीजें रही हैं, जिसके कारण लोग आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं। और दुनिया में हमेशा से ऐसी चीजें भी रही हैं जो लोगों को आत्महत्या करने से रोक लेती हैं और उन्हें फिर से जीवन में खींचकर यह अहसास कराती हैं कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। यह जीवन अपनी तमाम क्रूरताओं के बावजूद सुंदर है। फूल उतने ही चटख रंगों में खिलते हुए हमें खूबसूरती का अहसास बखूबी करा रहे हैं, कि अब भी इस जीवन में महक बरकरार है।

मुझे नहीं पता कि दुनिया का हर व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी आत्महत्या करने का सोचता है या नहीं लेकिन मैं अपने जीवन में एकबारगी इस अनुभव से गुजरा हूं कि अब यह जीवन लीला समाप्त कर लेना चाहिए। शायद ऐसे पल आते हैं जब लगता है कि जीवन की हरीतिमा सूख चुकी है और उसकी जगह काला-भूरा उजाड़ फैल रहा है जिसमें सांस लेना दूभर होता जा रहा है। लेकिन यकीन करिये मुझे कुछ चीजों ने आत्महत्या करने से बचा लिया और मैं जीवन में वापस लौट आया, उसकी सुंदरता को महसूस करता हुआ, उसके फूलों को निहारता हुआ, महकता हुआ...

यदि मेरे जीवन में रात, चंद्रमा, स्त्रियां और किताबें नहीं होती तो मैं कब का खत्म हो चुका था। मुझे एक शांत और गहराती रात ने, मुझे उस खूबसूरत घटते-बढ़ते चंद्रमा ने, मुझे स्त्रियों ने और अंततः मुझे किताबों ने आत्महत्या करने से बचा लिया...

मैं यदि अपनी किसी प्रिय किताब के पास भी बैठा होता हूं तो मुझे लगता है कि दूर कहीं एक लोरी की आवाज सुनाई दे रही है जो घने जंगलों के बीच से आ रही है। इस लोरी की आवाज जहां से आ रही है वहां एक नदी के बहने की आवाज भी आ रही है। और मैं जब इस आवाज पर जरा ज्यादा ध्यान देता हूं तो मुझे लगता है इसमें एक शीतलता है जिसमें मेरे हर ताप को और हर त्रास को हर लेने की ताकत है। अपनी प्रिय किताब के पास बैठने से कभी कभी लोरी की जो यह आवाज सुनाई देती है उसमें हलका उजाला है जो सबसे घने अंधेरे को रेशम की चादर में बदल देता है। इस आवाज के आने के पहले जो अंधेरा गाढ़ा होकर अपने वजन से मेरा गला दबाने की कोशिश कर रहा था वह हलका होकर एक ताजी हवा को अंदर आने देने वाले झरोखे में बदल जाता है।

किताबें मेरे लिए हमेशा एक झरोखा खोलती हैं। मुझे उसमें अपने हिस्से की गहराती रात दिखाई देती है जिसमें उगते तारे मुझे कभी अकेला नहीं होने देते हैं। किताब के इस झरोखे में मुझे अपना वह चांद दिखाई देता है जिसकी चांदनी के तार मुझे कायनात के उस संगीत में ले जाते हैं जहां मैं अपने ही भीतर गूंजती कोई विरल धुन सुनता हूं। किताब के इस झरोखे से मुझे वह हरापन दिखाई देता है जो मुझे जीवन में फिर से लौट आने का आमंत्रण देता है।

यह किताबों के कारण ही संभव है। आज इस वक्त, मैं जीवन में हूं, तो किताबों के कारण। आज मैं किसी रात मे, चांदनी भरी रात में किसी स्त्री के पास हूं, तो किताबों के कारण। आज मैं इसी चांदनी भरी रात में किसी स्त्री को प्रेम करने के काबिल हूं, तो किताब की वजह से। और आज मैं किसी स्त्री के आंसू का स्वाद जानता हूं, तो किताबों के कारण ही।
ये रात, ये चंद्रमा, ये स्त्री और किताबें नहीं होती तो पता नहीं मैं कहां होता?
मुझे हमेशा एक रात ने बचा लिया।
मुझे हमेशा एक चंद्रमा ने बचा लिया।
मुझे हमेशा एक स्त्री ने बचा लिया।
और मुझे हमेशा एक किताब ने बचा लिया....

Wednesday, May 20, 2009

पत्ता-पत्ता, जीवन का हर राग गाता रफ्ता-रफ्ता




वहां कैनवास पर पत्ते ही पत्ते हैं। झरते हुए, कभी एक साथ और कभी छितराए हुए। हरे-पीले, नारंगी-नीले, काले-भूरे। उजाले में आकर नाचते हुए, उदास हो कर अंधेरे में डूबते हुए। लगता है जैसे हरे-पीले पत्ते जीवन का राग गाते हुए स्वागत कर रहे हों, नारंगी-नीले वसंत के हर्ष में नाच रहे हों। काले-भूरे जैसे बिछड़ने के दुःख में, विषाद में विलाप कर रहे हों। ध्यान से देखो तो लगेगा ये कैनवास से निकलकर आपको घेर लेते हैं और अपने उड़ने में, भटकाव में, एक लय में जीवन के गहरे आशय बता रहे हों। जैसे कह रहे हों यही जीवन है जिसमें उत्साह के साथ निराशा है, दुख के साथ सुख है और अंततः वसंत के साथ पतझर भी है। जाहिर है ये कैनवास जीवन के स्वागत के, बिछोह के और हर स्पंदन के रूप हैं, प्रतीक हैं। रफ्ता-रफ्ता जीवन के हर राग को गाते हुए।
ये नए कैनवास रचे हैं इंदौर के युवा चित्रकार राजीव वायंगणकर ने। उनके इन चित्रों की एकल नुमाइश मुंबई के आर्टिस्ट सेंटर में 25 से 31 मई को लगने जा रही है। इसमें वे 30 नए चित्रों को प्रदर्शित करेंगे। उन्होंने इसका शीर्षक दिया है- पत्ता पत्ता।
उनके घर पर ताजा चित्रों को देखते हुए महसूस हुआ कि ये चित्र गहरे दार्शनिक आशयों के चित्र हैं। इन पत्तों में जीवन का मर्म प्रकट हो रहा है। लेकिन इन पत्तों को रचने में राजीव की कोई हड़बड़ाहट नहीं देखी जा सकती बल्कि एक इत्मीनान है, धीरज है। जैसे वे जीवन के आशयों को जानकर उन्हें अनुकूल रूपाकारों में ढाल रहे हैं। इसलिए उनके पत्तों में स्पंदन है, कम्पन्न है। वे एक सोची समझी रंग योजना में इस तरह प्रकट होते हैं कि अपने साथ उन आशयों को लपेटे हुए लिए आते हैं जिन्हें चित्रकार अभिव्यक्त करना चाहता है। इसीलिए राजीव कहते हैं कि इससे पहले मैं अपने को टुकड़ों में अभिव्यक्त कर रहा था अब लगता है मैंने अपने आपको सही दिशा और सही भाव भूमि पर अभिव्यक्त किया है। मैं अब इस जीवन-जगत को, इसके रहस्यों और आशयों को गहराई से समझ रहा हूं।
राजीव अपने कैनवास पर प्रकाश और छाया का सुंदर खेल रचते हैं। उनके इस हलके-गहरे प्रकाश में पत्ते अपने आकारों में रूपायित होकर कभी उजाले में पास आते लगते हैं तो गहरे रंगों में दूर जाते हुए तिरोहित होते लगते हैं। लेकिन इसके पहले उनकी थरथराहट कैनवास पर छूट जाती है और इस तरह उड़ते और दूर जाते हुए पत्ते कैनवास को अपने आशयों से अर्थवान बना देते हैं। इसी से कैनवास धड़कने लगता है। कहने की जरूरत नहीं कि पत्ते पृथ्वी की जीवंतता है। उनमें जीवन के उत्सव-उल्लास के रंग हैं लेकिन मृत्यु निश्चित है इसलिए राजीव इन उत्सव मनाते पत्तों के बीच कहीं कही मृत्यु के प्रतीक काले-भूरे पत्तों को सायास और सावधानीपूर्वक रचते हैं। इस जीवन और मृत्यु के बीच ही उनके पत्ते उड़ते रहते हैं और आपकी स्मृति में गिरते हैं। वे आपको छूते हैं. आपको घेरते हैं, और बिना आवाज किए चुपचाप आपको जीवन का मर्म समझा जाते हैं। हालांकि राजीव बिल्व पत्र की महिमा बताते हुए इन कैनवास पर एक ही श्लोक लिखते हैं जिसका अर्थ यह है कि इस पत्ते को शिव को अर्पित करने से तीन जन्मों के पापों से मुक्त हुआ जा सकता है। वे श्लोक को अपने हर कैनवास पर इस तरह से लिखते हैं कि वह भी पेंटिंग का अभिन्न हिस्सा हो जाता है , उसकी लय में लय मिलाता अपनी सार्थकता हासिल करता है।
राजीव ने पत्तों को इतनी संवेदनशीलता से रचा है कि उनकी बनावट और टोनल इफेक्ट आकर्षित करते हैं। फिर वे टेक्स्चर को लेकर काम करते हैं, रंगों की पतली गहरी सतहें बनाते हैं, और इस तरह से आंखों की संवेदना को जगाते हैं। रंगों के साथ उनका बरताव चैनदारी और कल्पनाशीलता का है। इस तरह वे कभी शाम, कभी सुबह, कभी अंधेरे, कभी उजाले में झरते पत्तों को चित्रित करने मे कामयाब हुए हैं। टेक्स्चर उनका अलंकार है। इससे वे कैनवास को सजाते हैं। ये कैनवास पत्ता टूटा डाली से पवन ले गई उडा़व जैसी काव्य पंक्ति के रूप हैं। जीवन चक्र को ज्यादा कल्पनाशील ढंग से अभिव्यक्त करते हुए। राजीव के इन कैनवास को देखना जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव और रहस्यों को देखना-समझना है। इसमें जीवन के कई मूड्स हैं।