Saturday, December 20, 2008

सर्द सन्नाटा है, तन्हाई है, कुछ बात करो


मैं क्यों बार-बार गुलज़ार साहब की ओर लौटता हूँ। उसमें हमेशा कोई दृश्य होता है, कोई बिम्ब होता है, बहुधा प्रकृति की कोई छटा होती है, लगभग मोहित करती हुई या मैं इसलिए उनकी तरफ लौटता हूँ कि उनमें मुझे हमेशा एक ताजगी या नयापन मिलता है, अपनी बात को कहने का एक शिल्पहीन शिल्प मिलता है।

क्या उनकी शायरी में सिर्फ रुमानीपन मिलता है जो मेरी खास तरह की सेंसेबिलिटी से मेल खाता है? क्या मैं उनकी कविता में किसी हसीन ख्वाहिश, मारू अकेलेपन या दिलकश खामोशी के वशीभूत लौटता हूँ? क्या उसमें स्मृतियाँ और स्मृतियाँ होती हैं, जिनकी गलियों और पगडंडियों से होकर गुजरते हुए हमेशा एक गीला अहसास होता है?

और ये अहसास भी ऐसे जैसे कोई खामोश मीठे पानी की झील हमेशा कोहरे से लिपटी रहती है? या कोई अपने में अलसाया पहाड़ को सिमटते कोहरे में बहते सब्जे से और भी सुंदर नजर आता है? या बनते-टूटते, खिलते-खुलते और सहमते-सिमटते रिश्तों का ठंडापन या गर्माहट है? या कि उनमें कोई जागते-सोते-करवट लेते ख्वाबों की बातें हैं? या कि सिर्फ अहसास जिन्हें रूह से महसूस करने की वे बात करते हैं? या कि इन सबसे बने एक खास गुलज़ारीय रसायन से बने स्वाद के कारण जिसका मैं आदी हो चुका हूँ?

शायद ये सब बातें मिलकर उनकी शायरी का एक ऐसा मुग्धकारी रूप गढ़ती हैं जिस पर मैं हमेशा-हमेशा के लिए फिदा हो चुका हूँ। इसीलिए इस बार संगत के लिए मैंने फिर से गुलज़ार की एक और नज़्म लैण्डस्केप चुनी है। यह भी एक दृश्य से शुरू होती है। दूर के दृश्य से। जैसे किसी फिल्म का कोई लॉन्ग शॉट हो। वे हमेशा अपनी बात को कहने के लिए कोई दृश्य खोजते हैं और खूबी यह है कि किसी में कोई दोहराव नहीं क्योंकि दृश्य को अपनी काव्यात्मक भाषा में रूपायित करने के लिए इसे बरतने का उनका तरीका अलहदा है, मौलिक है क्योंकि वे दृश्य को दृश्य नहीं रहने देते।

अपनी कल्पना के किसी नाजुक स्पर्श से, अपने भीतर उमड़ते-घुमड़ते किसी भाव या समय की परतों में दबी किसी याद से इतना मानीखेज़ बना देते हैं कि फिर वह दृश्य दृश्य नहीं रह जाता। यह उनकी खास शैली है जो उन्होंने रियाज से नहीं ज़िंदगी के तज़ुर्बों की निगाह से हासिल की है जो किसी शायर के पास ही हो सकती है।

यह नज़्म इन पंक्तियों से शुरू होती है-

दूर सुनसान से साहिल के क़रीब

इक जवाँ पेड़ के पास

इसमें साहिल है। यह दूर है। और वह सुनसान भी है। इसके पास एक पेड़ है, यह जवाँ है। दूर, सुनसान, साहिल, करीब और पेड़ जैसे सादा लफ्ज़ों से वे एक दृश्य बनाते हैं। लेकिन यह दृश्य यहीं तक सिर्फ एक दृश्य है। इसके बाद गुलज़ार की वह खास शैली का जादू शुरू होता है जिसे शिल्पहीन शिल्प कहा है। यानी कोई शिल्प गढ़ने की मंशा से आज़ाद होकर अपनी बात को इतने सादे रूप में कहना कि वह एक खास तरह के शिल्प में बदल जाए।

आगे की पंक्तियाँ पढ़िए-

उम्र के दर्द लिए, वक़्त का मटियाला दुशाला ओढ़े

बूढ़ा-सा पॉम का इक पेड़ खड़ा है कब से

यहाँ एक बूढ़े पॉम के पेड़ के जरिए एक व्यक्ति के अकेलेपन को कितनी खूबी से फिर एक दृश्य में पकड़ा गया है। यह पेड़ वक़्त का मटियाला दुशाला ओढ़े है। जाहिर है इस मटियालेपन में वक्त के बीतने का अहसास अपने पूरे रुमानीपन के बावजूद कितना खरा, खुरदरा और पीड़ादायी है। यह सदियों की खामोशी में अकेलेपन का गहरा अहसास है।

सालों की तन्हाई के बाद

झुकके कहता है जवाँ पेड़ से : 'यार

सर्द सन्नाटा है तन्हाई है

कुछ बात करो'

अब यह अकेलेपन का जो अहसास है, बहुत घना हो चुका है। और ऊपर से सर्द सन्नाटा है और तन्हाई है। जाहिर है यह सब कितना जानलेवा है। लेकिन खामोशी में सदियों के अकेलेपन को कहने की जो अदा है उसमें कोई चीख-पुकार नहीं है। जैसे बहुत ही गहरी एक आवाज़ है जो अपने पास खड़े एक जवाँ पेड़ से कुछ बात करने इच्छा जता रही हो।

यह एक पेड़ है जो सालों की तन्हाई में खड़ा है और झुक के कुछ बात करने के लिए कह रहा है। यह बात इतने सादा, इतने संयत और मैच्योर ढंग से कही गई है कि सीना चीर के रख देती है।

ना यह हमारी ही बात। हमारे अकेलेपन, हमारी खामोशी, हमारे सन्नाटे और हमारी तन्हाई की बात। इसे ध्यान से सुनिए, यह आपके कान में कही गई बात है, आपके दिल के किसी कोने से उठती बात है -

कि सर्द सन्नाटा है, तन्हाई है, कुछ बात करो।


पेंटिंगः रवीन्द्र व्यास

(वेबदुनिया के लिए लिखे जा रहे साप्ताहिक कॉलम संगत की एक कड़ी)

Wednesday, December 17, 2008

एक मारक, मोहक और मादक सम्मोहनः शकीरा


फिदा होना मेरी फितरत है और जिन पर फिदा हूं उनकी फेहरिस्त ज्यादा लंबी नहीं है। इस फेहरिस्त के छोटे-छोटे फासलों पर कुछ फनकार हैं जिनके फन में फनां होने का मन करता है। मैं दो कारणों से कोलंबिया पर फिदा हूं। यहां दो महान शख्सियतें हुईं। एक अदबी और दूसरी मौसिकी की। दोनों ही अपने फन के माहिर फनकार। दोनों की अदा सबसे अलहदा। दोनों ही जादुई। एक अपनी भाषा और कल्पना के जादुई यथार्थ या यथार्थ की जादुई कल्पना में जवां तो दूसरा अपने सुर और नाच में रवां। माय गॉड क्या हुनर पाया है दोनों ने। एक हैं हमारे गाबो यानी गैब्रियल गार्सिया मार्केज, हरदम अपनी कला के जिगर से भाषा, कल्पना और यथार्थ का ऐसा अद्भुत रसायन बनाते हुए जिसका आस्वाद ऐसा गूंगा बना देता है जिसने गुड़ चखा हो। और दूसरी हैं शकी यानी शकीरा। शकीरा इसाबेल मेबरिक रिपोल।

जहां गाबो अपने मैजिकल रियलिज्म के लिए मशहूर हैं तो दूसरी के बारे में मुझे कहने दीजिए अपने रियल मैजिकलिज्म के लिए।

मैं एक बार फिर शकीरा की ओर लौटा हूं। ३१ साल की जवानी में उसका जलवा इतना जानदार है कि वह जब थिरकती है तो लगता है एक कौंध मचलती-उछलती नाच रही है। उसकी थिरकन में बदन की बल खाती बिजलियां एक लपट की तरह आपको लपकने की कोशिश करती लगती हैं। उसका नाच एक अंतहीन आंच का आगोश है। उसकी आवाज आबशार की तरह आपको ठंडी राहत देती है तो कभी अंगारे की आंच का अहसास भी कराती है। कई बार उसकी आवाज अपनी मखमली अंगुलियों से आपकी रूह को गुदगुदाने लगती है तो कभी अंगुली पकड़कर आपको इश्क के बियाबान में भटकने के लिए छोड़ आती है। उसको गाते-नाचते देखता हूं तो उसके बदन की लयात्मक हरकत से ज्यादा उसकी उस कल्पनाशील रचनात्मकता पर फिदा होता हूं जिसके जरिए वह ऐसा मारक, मोहक और मादक सम्मोहन रचती है।

यह ऐसे ही संभव नहीं हुआ।

जब वह चार साल की थी उसके भाई की अचानक मौत हो जाती है। उसके लिए यह जीवन का पहला सदमा। चार साल की उम्र में इस सदमे से मिले दुःख को वह कविता में ढालती है और उसका यह दुःख कविता में कोंपल की तरह फूट कर अपनी नन्ही हथेलियां हिलाता है। आठ की होते-होते वह एक गीत रचती है, इसे अकेले में गुनगुनाती है। एक दिन अचानक एक रेस्त्रां में टेबल पर नंगे पांव नाचने लगती है। सब अवाक। ११ की उम्र में गिटार पर उसकी अंगुलियां फिसलने लगती है और फिजां में मीठी स्वर-लहरियां गूंजती हैं।

बस यहीं से वह सांगीतिक सफर शुरू होता है जिसमें सुंदर गीत हैं, दिल को छू लेने वाले बोल हैं, शांत और उद्दाम संगीत है और साथ ही चमत्कृत कर देने वाला लचकता नाच भी है। फिर क्या, शकीरा ने लिखी शोहरत के शिखर पर कामयाबी की नई इबारत। पैसों की झमाझम बारिश और आलीशान जीवन की चकाचौंध। आज वह कोलंबिया की सबसे ज्यादा धन कमाने वाली गायिका बन गई है। फोर्ब्स ने उसे दुनिया की चौथी सबसे अमीर गायिका घोषित किया है। वह ३८ मिलियन डॉलर सालाना कमाती है। फ्लोरिडा में साढ़े छह हजार फीट पर बना आलीशान भवन उसे अब छोटा लगता है।

वह रॉक एन रोल की दीवानी है, उसे अरेबिक संगीत मोह लेता है, बैली डांस की अदाएं उसकी प्रेरणाएं बनती हैं। वह द बीटल्स, द पोलिस, द क्योर और निर्वाणा जैसे बैंड से बेहद प्रभावित है। उसके संगीत और नाच में दुनियाभर के संगीत की खूबियों का संतुलित रसायन मिलेगा जिसका आस्वाद सिर्फ शकीरा के गीत-संगीत में ही पाया जा सकता है। वह तो कहती भी है कि मैं रॉक म्यूजिक से प्यार करती हूं लेकिन मेरे पिता सौ फीसदी लेबनानी हैं इसलिए मैं अरबी संगीत के स्वाद और ध्वनियों की भी दीवानी हूं। इन्हीं के प्रति मेरा प्रेम और लगाव कई बार मेरे संगीत में फ्यूजन की तरह गूंजता है।

एक प्रोड्यूसर मोनिका एरीजा ११ साल की उम्र में ही शकीरा के टैलेंट को ताड़ लेती हैं और विश्वविख्यात म्यूजिक कंपनी सोनी में आडिशन करवाती हैं। पहले आडिशन में वह फेल हो जाती है लेकिन कुछ समय के अंतराल के बाद उसे तीन एलबम का कॉन्ट्रेक्ट मिलता है। पहले दो एलबम मैजियो (१९९१), पेलिग्रो (१९९३) फ्लॉप हो जाते हैं लेकिन न्यू एस्त्रों रॉक एलबम में उसका योगदान उसे जबरदस्त कामयाबी दिलाता है और फिर तीसरा एलबम पेएस डेस्काल्जोस (१९९५) इतना हिट हो जाता है कि उसकी पचास लाख कॉपियां हाथों हाथ बिक जाती हैं। इसके बाद डोंड इस्तान लॉस लेड्रोंस से और बड़ा एक्सपोजर मिलता है। वह एमटीवी म्यूजिक और ग्रेमी अवॉर्ड हासिल करती है। इतनी ख्याति पाने के बाद उसका अब तक कोई इंग्लिश एलबम नहीं आता है। दुनियाभर के लोगों का दिल जीतने के लिए ग्लोरिया इस्टीफेन की मदद से अपना पहला इंग्लिश एलबम लाती है-लॉन्ड्री सर्विस। इसे अपार लोकप्रियता हासिल होती है। इसकी एक करोड़ तीस लाख कॉपियां बिक जाती हैं और जब २००६ में उसका दूसरा इंग्लिश एलबम अोरल फिक्सेशन (दो वाल्यूम में) आता है तो वह एक अमेरिकन और तीन ग्रेमी अवॉर्ड अर्जित करती है। इस एलबम के गीत हिप्स डोंट लाई तो वह ऐसा गाती और नाचती है कि दुनिया उस पर फिदा हो जाती है। उसका यह एलबम यूएस और यूके चार्ट में अव्वल नंबर पर आता है। इसके बाद शकीरा शकीरा, व्हेनएवर व्हेनएवर आदि गीतों को भी खूब शोहरत मिलती है।

२००७ में वह अपने ही हमवतन दिग्गज उपन्यासकार मार्केज के उपन्यास लव इन द टाइम अॉफ कॉलरा पर इसी नाम से बनी फिल्म में न केवल एक छोटी सी भूमिका निभाती है बल्कि दो गीत लिखती भी है और गाती भी है। वह ऐसी गायिका है जो अपने गीत खुद लिखती है या अपनी साथी गीतकार के साथ लिखती है। उसके गीत हजार तरह से प्रेम करने के लिए स्त्री की पुकार के गीत हैं। उसमें उद्दाम और कोमल इच्छाएं अभिव्यक्त होती हैं। उसके लिखे गीत की एक पंक्ति है-तुम ईश्वर के हाथों लिखे गए गीत हो। कई बार वह प्रेम से लबालब भरे गीतों को गाते हुए लगभग बदहवास सी नाचने लगती है। वह कहती है मेरे प्रशंसक सोचेंगे कि मैं न्यूरॉटिक हूं। मैं तो अॉब्सेसिव कम्पल्सिव परफेक्शनिस्ट हूं। यह उन्हें पसंद है या नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन इतना तय है कि वे मुझे ज्यादा समझने की कोशिश करेंगे। इससे वे समझ पाएंगे कि मेरी जिंदगी का मकसद क्या है? मैं किसके लिए लड़ रही हूं और वह क्या है जो मुझे प्रेरित करता है, मुझे गतिशील रखता है। मैं महसूस करती हूं ऐसा करके मैं अपने प्रशंसकों के और भी करीब आ जाती हूं, जो शायद इसके पहले संभव नहीं हुआ था।वह प्रेम में डूबी है और उसका प्रेम है अर्जेंटीना के भूतपूर्व राष्ट्रपति का बेटा।

खबर है कि वह इन दिनों इटैलियन गायक ताजियानो फैरो के साथ भी गाना गाने वाली है। हाल-फिलहाल वह कार्लोस संताना के साथ अपने नए एलबम इल्लिगल को बनाने में मसरूफ है।

उसका मानना है कि जिदंगी में ऐसे पल आते हैं जब जिंदगी खुद को सरल करती है और तब हम अपनी हथेलियों में भाग्य के बारे में कुछ भी नहीं पूछते। और हम फिर अपनी मनपसंद कविताएं पढ़ना शुरू करते हैं और कभी कभी अपनी कविताएं लिखने का साहस । हम हमेशा फिर-फिर प्रेम में डूबने लगते हैं...

दिलचस्प-दिलकश शकीरा

१।मैं सोचती हूं मेरे बदन का सबसे खूबसूरत अंग मेरा दिमाग है।

२। मुझे जेवर बिलकुल पसंद नहीं, मेरी सेहत ही मेरा जेवर है।

३। औरतें कभी संतुष्ट नहीं हो सकती क्योंकि पुरुषों के मुकाबले वे ज्यादा जटिल होती हैं।

४. मैं बिना मैकअप के घर से बाहर नहीं निकलती, आप जानते हैं, मैं एक महिला हूं।

शकीरा ः एक नजर

१। जन्म दो फरवरी १९७७ बेरेंक्विला (कोलंबिया)।

२। मां नीदिया रिपोल, लेबनानी पिता विलियम मेबरेक।

३। शकीरा का अरबी में अर्थ है-गरिमामयी स्त्री।

४। दुनिया की सौ सबसे हॉट सेलिब्रिटी में शामिल।

५। चैरिटी के जरिये उत्तरी कोलंबिया में गरीब बच्चों के स्कूल खोलना चाहती हैं।

६। यूनिसेफ की गुडविल एम्बेसेडर

७.स्पैनिश कंपनी के साथ कॉस्मेटिक्स प्रॉडक्ट्स की रेंज लांच की।

८. सन सिल्क के इंटरनेशनल एड में मैडोना और मर्लिन मुनरो के साथ।

९. हाइट पांच फुट दो इंच।

१०. वजन १०६ पौंड

Saturday, November 29, 2008

रुदन जो पहुंचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक


मुंबई में आतंकवादी हमले के घेरे में डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें और इस घेरे में घायलों की गूँजती चीखें इस घेरे का व्यास और मारकता ज्यादा बढ़ाती हैं। इस पागलपन का असर कहाँ तक गया है, इसका अंदाजा शायद राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियो, समाजशास्त्रियों, पुलिस और कानून के विशेषज्ञों द्वारा अलग अलग लगाया जाएगा और इनकी राय, विश्लेषण और इससे निकलने वाले विचार महत्वपूर्ण माने जाएँगे लेकिन इस तरह की घटनाओं और पागलपन को एक कवि की निगाह बिलकुल भिन्न तरह से देखती-दिखाती है। एक कवि अपने समय की बड़ी घटनाओं और चीखों-चीत्कारों का ज्यादा मानवीय और मानीखेज ढंग से बखान करता है।

इजराइल के महान कवि येहूदा अमीखाई की एक कविता बम का व्यास इस तरह की हिंसा भरी घटनाओं की दूर तक फैली हद में आए लोगों के दुःख को अपनी नैतिक संवेदना के साथ इतनी मारकता से अभिव्यक्त करती हैं कि आप गहरे विचलित हो जाते हैं। येहूदा अमीखाई अपनी कविता में अचूक दृष्टि और गहरी मानवीय प्रतिबद्धता से अपने समय की हलचलों को इस तरह छूते हैं कि वह अपनी तमाम स्थानीयता और भौगोलिकता को पार करते हुए एक सार्वभौमिक सत्य को उद्घाटित करती है। हिंसा, युद्ध और आतंक तथा अपने समय की सचाइयों को उन्होंने बिना चीखे-चिल्लाए अपने संयत रचनात्मक कौशल से अभिव्यक्त किया। इसकी मार्मिकता हमें गहरे तक विचलित करती है। उनकी इस कविता बम का व्यास में जो सच और मर्म है वह अपनी नैतिक संवेदना में थरथराता हुआ तमाम तरह की हिंसा के खिलाफ एक तीखा प्रतिरोधी स्वर बन जाता है। कविता इन पंक्तियों से शुरू होती है-

तीस सेन्टीमीटर था बम का व्यास

और इसका प्रभाव पड़ता था सात मीटर तक

चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए

शुरूआत की इन तीन पंक्तियों में कुछ सूचनाएँ हैं। ये सूचनाएँ लगभग खबर के अंदाज में हैं। इसमें एक तरह का भावनात्मक सूखापन साफ लक्षित किया जा सकता है क्योंकि इनमें आंकड़े हैं और इन पर अपनी तरफ से कोई टिप्पणी करने की कोशिश नहीं की गई है। चौथी और पाँचवी पंक्ति में भी सूचना है लेकिन यहां संवेदना का स्पर्श है। दो अस्पताल और एक कब्रिस्तान के तबाह होने की बात है लेकिन कवि की निगाह यह बताने से नहीं चूकती कि इनके चारों तरफ एक बड़ा घेरा है दर्द और समय का। इनके चारों तरफ़ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का

दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए

इस तरह की घटना को कवि की निगाह किस तरह देखती है इसकी काव्यात्मक मिसाल काबिले गौर है लेकिन वह जवान औरत जिसे दफ़नाया गया शहर में

वह रहनेवाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की

वह बना देती है घेरे को और बड़ा

इन पंक्तियों में सौ किलोमीटर आगे रहने वाली एक जवान औरत को दफनाने की सूचना धीरे-धीरे काव्य संवेदना में थरथराती हुई इस घेरे को और बड़ा बनाती जा रही है। जाहिर है जिस बम का व्यास तीन सेंटीमीटर था वह अब कवि की निगाह से लगातार फैलता जा रहा है। कविता यही करती है। वह अपनी तरलता और संवेदना में एक बड़े सच को, उसमें छिपे मर्म को इसी तरह व्यक्त करती है। अब यह घेरा और बड़ा हो रहा है क्योंकि जिस बम से मरी औरत का आदमी सुदूर किनारों पर उसका शोक कर रहा है जो समूचे संसार को इस घेरे में ले रहा है।

और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार

किसी देश के सुदूर किनारों पर

उसकी मृत्यु का शोक कर रहा था

समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में

कहा जाता है कि हिंसा का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएँ और बच्चे होते हैं। यदि हम आँकड़ें और उन तमाम खबरों को यहाँ न भी दें तो यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंसा की मार कहाँ-कहाँ और किस-किस तरह महिलाओं और बच्चों पर पड़ती है। कवि अपनी आखिरी पंक्तियों में जो सच बताने जा रहा है वह इस कविता को कितना बड़ा बना देता है, इस बम के व्यास के घेरे को कितना फैला देता है, इन पंक्तियों को पढ़िए-

और अनाथ बच्चों के उस रुदन का तो मैं

ज़िक्र तक नहीं करूँगा

जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक

और उससे भी आगे

और जो एक घेरा बनाता है बिना अन्त

और बिना ईश्वर का ...

जैसा कि इस टिप्पणी में पहले कहा गया है कि एक कवि की निगाह इस घटना को कितनी गहरी संवेदना के जल में थरथराते हुए देखते-दिखाती है कि हम गहरे विचलित हो जाते हैं। इस बम विस्फोट में कवि उन अनाथ बच्चों के रूदन का जिक्र नहीं करना चाहता जो ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक और उससे भी आगे चला गया है। यह रूदन ही वह घेरा बनाता है अंत का और बिना ईश्वर का। कहने की जरूरत नहीं कि एक कवि ही वह अनसुना रूदन सुना सकता है जिससे हमारी आत्मा तक सिहर जाती है। सचमुच एक कवि हमारे सामने कितना बड़ा और बारीक मर्म उद्घाटित कर रहा है जिसमें अनाथ बच्चों के रूदन का अंतहीन और बिना ईश्वर का घेरा है। इस कविता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह कविता अपने को भावुकता से बचाती हुई उस नैतिक संवेदना से बनी है जो तमाम हिंसा के खिलाफ एक प्रतिरोध है।


कविता का अनुवाद ः अशोक पांडे
पेंटिंग ः रवीन्द्र व्यास

(यह वेबदुनिया के लिए लिखे जा रहे साप्ताहिक कॉलम संगत की एक कड़ी है। मैं इसे मुंबई में आतंकी हमले में मारे गए इंदौर के युवा इंजीनियर गौरव जैन को समर्पित करता हूं।)

Saturday, November 15, 2008

इति जैसा शब्द



हेमन्त शेष की कविता


नर्म और सुगंधमयी कोंपलों की तरह
फूट आती हैं नीली
कांपती हुई इच्छाएं
अनसुने दृश्यों और अनदेखी आवाज़ों के स्वागत में
प्रेम खोल देता है आत्मा की बंद खिड़की


वहां बिलकुल शब्दहीन
अोस से भरी हवाएं प्रवेश कर सकती हैं


देह की दीर्घा की हर चीज़
भीगी और मृदुल जान पड़ती है


बेचैन हाथों से
मृत्यु और काल का प्राचीन फाटक खोलकर
पूरी पृथ्वी पर बचे दो लोग आचमन के लिए
अलौकिक रोशनी से भरे तालाब की तरफ़ आते हैं


भय और आशंका की असंख्य लहरें गड्‍डमड्ड कर देती हैं स्पर्शों के बिम्ब


सिर्फ़ रात के आकाश की कलाई पर गुदा हुआ मिलता है
स्थायी हरा चंद्रमा
जिसके हर गुलाबी पत्थर पर लिखा वे
एक-दूसरे का नाम देखते हैं


वहां से झीने आलोक में डूब दिन उन्हें
जहाज़ों की तरह तैरते नज़र आते हैं
अनन्त दूरियां और विस्तारों तक जिन्हें ले जाते हैं आकांक्षा के पंख


शरीर में जागे हुए करोड़ों फूलों और
कुहरे में झिलमिलाते हुए जुगनूअों जैसी
मौलिक लिपि में
प्रेमीगण बार-बार लिखते हैं
संसार की सबसे प्राचीन त्रासद पटकथा


वे जिसकी बस
कांपती हुई नीली शुरूआत जानते हैं


इति जैसा कोई शब्द
प्रेम के शब्दकोश में नहीं होता।

(कवि के प्रति गहरा आभार प्रकट करते हुए और इस कविता के साथ अपनी पेंटिंग लगाकर कृतज्ञ महसूस करते हुए)

Tuesday, November 11, 2008

एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा



एक बार खिलता फूल कहूंगा
एक बार जिगर में अंगारा
एक बार गहराती रात कहूंगा
एक बार झिलमिल तारा


एक बार जागा सपना कहूंगा
एक बार हाथ में लकीर
एक बार धूनी रमाता कहूंगा
एक बार गाता फकीर


एक बार दर दर भटका कहूंगा
एक बार मिला कमंडल
एक बार ये है चिमटा कहूंगा
एक बार अलख निरंजन


एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
एक बार टपका आंसू
एक बार पहाड़ काटूंगा कहूंगा
एक बार नदी में झांकूं


पेंटिंग ः मार्क शागाल

Saturday, November 8, 2008

बारिश की आवाज़ (अंतिम किस्त)


अचानक बारिश तेज होने लगती है लेकिन मैं बारिश की परवाह किए बिना धीरे-धीरे चलने लगता हूं। मैं देखता हूं लोग भागते हैं और सिर छिपाने की जगह ढूंढ लेते हैं। कोई चाय के टपरे के नीचे या घने पेड़ के नीचे शरण लेता है। कोई आड़ ढूंढ़ लेता है, कोई छाते के नीचे बुला लेता है और दोस्त की तरह कंधे पर हाथ ऱखकर धीरे से मुस्करा देता है। एक मां अपने बच्चे को आंचल से ढांक लेती है और बच्चा टुकुर-टुकुर बौछारों को देखते रहता है। कुछ युवा हैं जो उम्र की इस दहलीज पर खड़े बारिश को मनमानी करने देते हैं। एक लड़की खिड़की में बैठी बारिश को देख रही है। बारिश के इस संगीत में उसके होठों पर कोई गीत है जिसे वह बारिश की लय के साथ गुनगुना रही है। हो सकता है, उसकी स्मृति में पहले चुम्बन की बारिश हो और उसी चुम्बन की मिठास में वह गुनगुना रही हो।
कुछ स्त्रियां फैक्टरी से निकली हैं और बारिश में अपने आप सिमट जाती हैं। जैसे यह सिमटना उन्हें बारिश में भीगने से बचा लेगा। वे भागने लगती हैं तो उनकी सांवली और ठोस पिंडलियां श्रम की आभा में चमकती हैं। वे पोलिथिन की थैलियों निकालती हैं और अपने सिरों में फंसा लेती हैं। भीड़ में अपना पल्लू संभालती हैं और चौकस निगाहों से तेजी से चलने लगती हैं।
उधर फुटपाथ पर एक भिखारी बारिश में अपने घर को संभालता है। अपना कम्बल और बची-खुची रोटी बचाता है। बस स्टॉप के शेड में वह अपना फटा कुरता झटकारता है और आसमान की अोर मुंह उठाकर बड़बड़ाता है। उसकी बड़बड़ाहट को अनसुना करते हुए लोग तितर-बितर भाग रहे हैं।
मंदिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ है। मंदिर के सामने जूते-चप्पलों का अंबार लगा है और चारों तरफ मंदिर की घंटियों की आवाज गूंज रही है। दर्शनार्थी घंटी बजाते हैं तो सूखी रोटियां चबाते हुए भिखारी सिर उठाकर थोड़ी देर मंदिर की तरफ देखता है और फिर सिर झुकाकर रोटियां चबाने लगता है।
मैं पूरा तर-बतर हो चुका हूं औऱ मेरे जूतों में पानी भर चुका है। घर पहुंच कर जूते उतारता हूं तो पिता के जूतों से निकलते गंदले पानी की आवाज गूंजती है। मैं सिर पोंछता हूं और मेरी कनपटी पर पानी की बूंदें थोड़ी देर ठहरकर फिसलने लगती हैं। मैं जेब से दोस्तों के गीले हो चुके पते निकालता हूं और डायरी में रख देता हूं।
मैं छींकने लगता हूं तो मां अचानक चौंकती है और काढ़ा लाकर कहती है-पी ले, सर्दी नहीं होगी। मां की इस आवाज के पीछे मैं कई-कई बारिशों की आवाजें फिर से सुनता हूं। बारिश में मां कई दिनों तक चुप रहती हैं और अपना काम करती रहतीं। पिता, मां को चुपचाप काम करता हुआ देखते रहते।
कई दिनों बाद धूप निकली है। आसमान एकदम साफ और नीले कांच की तरह चमक रहा है। पेड़ साफ धुले नहाए अपने हरेपन में मुस्करा रहे हैं। अचानक मुझे हंसी की आवाज आती है। बहुत मुलायम हंसी। ऐसी हंसी जिसे सुनकर संतूर याद आए।
मैंने ऐसी हंसी बहुत दिनों के बाद सुनी थी और यह हंसी घर में से ही आ रही थी। मैं अंदर गया तो देखा मां छत की अोर देखकर हंस रही थी। कवेलू वाली हमारी छत में एक बड़ा छेद हो गया था और उसमें से धूप झर रही थी।
धूप मां के चेहरे पर झरने की तरह गिर रही थी और मां की हंसी का उजलापन पूरे घर में फैल गया था।
मैं मां की हंसी के उजलेपन में खड़ा मां की हंसी सुन चुपचाप सुन रहा था।
मैं बहुत खुश था और हलके बादलों की तरह आसमान में उड़ना चाहता था। मैंने सोचा ऐसे में दोस्तों को पत्र लिखना चाहिए। मैंने बहुत दिनों बाद पत्र लिखा। एक दोस्त का जवाब आया। मैंने उसे खोला और पढ़ना शुरू किया।
दोस्त ने लिखा था-तेरा पत्र पढ़कर ऐसा लगा कि धूप में बारिश हो रही है....

Tuesday, November 4, 2008

बारिश की आवाज़ (दूसरी किस्त)



बाहर पानी भरी सड़क पर इक्का -दुक्का वाहनों की आवाज़ें आती । बीच-बीच में नेपाली की सीटी की आवाज़ गूंजती सुनाई पड़ती और उसमें कुत्ते के भौंकने की आवाज अजब तरह से मिल जाती। कोई एक हे राम कहता हुआ निकल जाता। पेड़ों की सरसराहट से लगता बारिश बीच-बीच में तेज़ हो रही है।
हमारे घर के आगे पीपल और पिछवाड़े नीम का पेड़ है। बारिश में ये पेड़ जटाधारी की तरह हिलते हुए भयावह लगते और हमें कभी-कभी लगता ये पेड़ हमारे घर पर गिरकर उसे धराशायी कर देंगे। लेकिन सालों से ये पेड़ बारिश में झूमते रहते और हमारे घर की देह कांपती रहती ।
जब बारिश बंद हो जाती तो उसके बहुत देर बाद तक हमारे घर की छत पर कभी बौछारों या बूंदों के टपकने की आवाज़ आती रहती। छत पर पेड़ों की डगाल झूलती रहती और पत्तों से फिसलता पानी हमारी छत पर टपकता रहता। बहुत तेज़ हवा चलती तो हमें लगता बारिश फिर से शुरू हो गई है। हवा के चलने से पत्तों पर ठहरा पानी एक साथ गिरकर छतों पर गिरता तो लगता बारिश हो रही है। पेड़ की सरसराहट से भी बारिश की आवाज़ निकलती रहती।
कई बार सिर्फ टप् टप् टप् टप् की आवाज़ आती। जैसे बरसों से इकट्ठा हुआ पानी पत्थरों में पैदा हुई दरारों से रिसता हुआ धीरे-धीरे टपक रहा हो। इन बूंदों की आवाज़ घर में एक अजीब वातावरण पैदा करतीं। उस आवाज़ को लगातार सुनते हुए पिता का चेहरा कंदरा में बैठे किसी साधु की तरह लगता। बारिश के दिनों में दिन में भी अंधेरा लगतार् जैसे हम किसी कंदरा यद में बैठे हों।
रात में सोते हुए हमें यही लगता कि हम किसी कंदरा में सो रहे हैं लेकिन छत पर बिल्ली के चलने की आवाज़, सड़क पर कुत्ते के भौंकने और गाय के रंभाने की आवाज़ से या फिर सीटी की आवाज़ सुनकर हमें लगता हम कंदरा में नहीं, अपने घर में ही सो रहे हैं।
सुबह हम उठते तो सबसे पहले रसोईघर से खटर-पटर की आवाज़ सुनते। फिर मां की आवाज़ होती और इसके पीछे पेड़ों के सरसराने की आवाज़ होती। एक पक्षी की आवाज़ भी हम सुनते जिसे हमने कभी देखा नहीं।
हम भाई-बहन कुल्ला करने और चाय पीने के बाद पहला काम यही करते कि आंगन में आकर पानी में छपाक् छपाक् खेलते। मां चिल्लाती कि सर्दी हो जाएगी लेकिन हम अपनी छपाक् छपाक् में मगन रहते। फिर आसमान की अोर मुंह उठाकर गाने लगते-पानी बाबा आना, ककड़ी भुट्टा लाना।
अपने बचपन के दोस्तों के नाम मैं भूल गया लेकिन उनके चेहरे मुझे याद आते हैं। एक दोस्त के माथे पर चोट का निशान था। मैं जब भी उसे याद करता हूं तो सबसे पहले वह चोट का निशान याद आता है। पता नहीं, माथे पर वह चोट का निशान उसे कैसे पड़ा? वह कहीं से गिर पड़ा था या किसी ने उसे मारा था या जन्मजात था, मुझे याद नहीं। लेकिन जब उसके पिता ट्रांसफर होकर जाने लगे तो उस वक्त बारिश हो रही थी। वे सब तांगे में बैठ चुके थे। मेरा वह दोस्त भी। मैं खिड़की में बैठा तांगे को जाते हुए देख रहा था। तांगा थोड़ी दूर ही गया होगा कि उस दोस्त ने अपनी जेब से आधा खाया भुट्टे का टुकड़ा निकाला और मेरी तरफ उछाल दिया। भुट्टे का वह टुकड़ा एक क्षण के लिए धूप में चमका और छप्प से पानी भरे गड्ढे में गिरा। वह छप्प की आवाज़ और दोस्त का हिलता हुआ हाथ मेरी स्मृति में हमेशा के लिए ठहर गया।
और यह बारिश की आवाज़ ही थी जो मेरे बड़े होने के साथ-साथ यहां तक चली आई थी। बारिश में ही मेरे नए दोस्त बने और पुराने छूटे। मुझे अच्छी तरह याद है जब हम दोस्तों को पहली नौकरी मिली थी तो एक रायपुर, एक बालाघाट और एक फरीदाबाद चला गया। कुछ इसी शहर में रह गए थे। फिर एक के पिता, दूसरे का भाई और तीसरे की मां मर गई थी और बारिश में हम एक-दूसरे के आत्मीयजनों को चिटकती चिता में जलता देख रहे थे। हमारे अंदर रह रहकर कुछ चीजें गिरती रहती थीं और हम आंखें बंद किए उनका दरकना और गिरना सुनते रहते थे।
फिर कुछ दिनों बाद हमने बिना बोले विदा ली। वे हाथ हिलाते हैं और मैं उनका कांपना देखता हूं। वे मेरी फीकी हंसी की अोट में रुलाई को सुनते हैं। वे धीरे-धीरे चलने लगते हैं। पानी भरी सड़क पर उनकी पदचाप सुनता हूं, अपनी पीठ के पीछे। वे जा चुके हैं। और बारिश मुझे भिगो रही है। मैं अकेला धीरे-धीरे चलने लगता हूं। जो दोस्त विदा ले चुके हैं उनके सुनाए चुटकुले याद आते हैं और ठहाकों की गूंज सुनाई पड़ती है।
दोस्त विदा ले चुके हैं लेकिन लगता है, बांए कंधे पर एक दोस्त का हाथ अब भी रखा हुआ है।
विदा होने से पहले हमने अपनी-अपनी प्रेमिकाअों को याद किया। फिर हमने सोचा प्रेम-पत्रों का क्या किया जाए। एक ने कहा इनकी नाव बनाकर बारिश के पानी में छोड़ा जा सकता है। हम सभी दोस्तों ने ऐसा ही किया और प्रेम-पत्रों की नाव पानी में तैर रही थी। फिर हमने तेजी से एक ट्रक को आते देखा जो हलका-सा चर्ररर करता हुआ निकल गया। हमने देखा ट्रक के पहियों पर हमारे प्रेम-पत्र चिपके थे। हम सब दोस्त भागते ट्रक की आवाज़ सुनते रहे और पहियों के साथ घूमते हुए अपने प्रेम-पत्र देखते रहे।
बारिश अब भी हो रही थी और उसमें हम भीग रहे थे....
(इस कहानी का एक और टुकड़ा जल्द ही)


पेंटिंग-रवींद्र व्यास