Saturday, November 8, 2008

बारिश की आवाज़ (अंतिम किस्त)


अचानक बारिश तेज होने लगती है लेकिन मैं बारिश की परवाह किए बिना धीरे-धीरे चलने लगता हूं। मैं देखता हूं लोग भागते हैं और सिर छिपाने की जगह ढूंढ लेते हैं। कोई चाय के टपरे के नीचे या घने पेड़ के नीचे शरण लेता है। कोई आड़ ढूंढ़ लेता है, कोई छाते के नीचे बुला लेता है और दोस्त की तरह कंधे पर हाथ ऱखकर धीरे से मुस्करा देता है। एक मां अपने बच्चे को आंचल से ढांक लेती है और बच्चा टुकुर-टुकुर बौछारों को देखते रहता है। कुछ युवा हैं जो उम्र की इस दहलीज पर खड़े बारिश को मनमानी करने देते हैं। एक लड़की खिड़की में बैठी बारिश को देख रही है। बारिश के इस संगीत में उसके होठों पर कोई गीत है जिसे वह बारिश की लय के साथ गुनगुना रही है। हो सकता है, उसकी स्मृति में पहले चुम्बन की बारिश हो और उसी चुम्बन की मिठास में वह गुनगुना रही हो।
कुछ स्त्रियां फैक्टरी से निकली हैं और बारिश में अपने आप सिमट जाती हैं। जैसे यह सिमटना उन्हें बारिश में भीगने से बचा लेगा। वे भागने लगती हैं तो उनकी सांवली और ठोस पिंडलियां श्रम की आभा में चमकती हैं। वे पोलिथिन की थैलियों निकालती हैं और अपने सिरों में फंसा लेती हैं। भीड़ में अपना पल्लू संभालती हैं और चौकस निगाहों से तेजी से चलने लगती हैं।
उधर फुटपाथ पर एक भिखारी बारिश में अपने घर को संभालता है। अपना कम्बल और बची-खुची रोटी बचाता है। बस स्टॉप के शेड में वह अपना फटा कुरता झटकारता है और आसमान की अोर मुंह उठाकर बड़बड़ाता है। उसकी बड़बड़ाहट को अनसुना करते हुए लोग तितर-बितर भाग रहे हैं।
मंदिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ है। मंदिर के सामने जूते-चप्पलों का अंबार लगा है और चारों तरफ मंदिर की घंटियों की आवाज गूंज रही है। दर्शनार्थी घंटी बजाते हैं तो सूखी रोटियां चबाते हुए भिखारी सिर उठाकर थोड़ी देर मंदिर की तरफ देखता है और फिर सिर झुकाकर रोटियां चबाने लगता है।
मैं पूरा तर-बतर हो चुका हूं औऱ मेरे जूतों में पानी भर चुका है। घर पहुंच कर जूते उतारता हूं तो पिता के जूतों से निकलते गंदले पानी की आवाज गूंजती है। मैं सिर पोंछता हूं और मेरी कनपटी पर पानी की बूंदें थोड़ी देर ठहरकर फिसलने लगती हैं। मैं जेब से दोस्तों के गीले हो चुके पते निकालता हूं और डायरी में रख देता हूं।
मैं छींकने लगता हूं तो मां अचानक चौंकती है और काढ़ा लाकर कहती है-पी ले, सर्दी नहीं होगी। मां की इस आवाज के पीछे मैं कई-कई बारिशों की आवाजें फिर से सुनता हूं। बारिश में मां कई दिनों तक चुप रहती हैं और अपना काम करती रहतीं। पिता, मां को चुपचाप काम करता हुआ देखते रहते।
कई दिनों बाद धूप निकली है। आसमान एकदम साफ और नीले कांच की तरह चमक रहा है। पेड़ साफ धुले नहाए अपने हरेपन में मुस्करा रहे हैं। अचानक मुझे हंसी की आवाज आती है। बहुत मुलायम हंसी। ऐसी हंसी जिसे सुनकर संतूर याद आए।
मैंने ऐसी हंसी बहुत दिनों के बाद सुनी थी और यह हंसी घर में से ही आ रही थी। मैं अंदर गया तो देखा मां छत की अोर देखकर हंस रही थी। कवेलू वाली हमारी छत में एक बड़ा छेद हो गया था और उसमें से धूप झर रही थी।
धूप मां के चेहरे पर झरने की तरह गिर रही थी और मां की हंसी का उजलापन पूरे घर में फैल गया था।
मैं मां की हंसी के उजलेपन में खड़ा मां की हंसी सुन चुपचाप सुन रहा था।
मैं बहुत खुश था और हलके बादलों की तरह आसमान में उड़ना चाहता था। मैंने सोचा ऐसे में दोस्तों को पत्र लिखना चाहिए। मैंने बहुत दिनों बाद पत्र लिखा। एक दोस्त का जवाब आया। मैंने उसे खोला और पढ़ना शुरू किया।
दोस्त ने लिखा था-तेरा पत्र पढ़कर ऐसा लगा कि धूप में बारिश हो रही है....

4 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया लेखन!!

डॉ .अनुराग said...

शानदार लेखन.....निसंदेह !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

""धूप मां के चेहरे पर झरने की तरह गिर रही थी और मां की हंसी का उजलापन पूरे घर में फैल गया था।""..बहुत प्यारी सी हँसी है आपके लफ्जों की भी ..बारिश और धूप ...बहुत मीठी सी बहुत सी बातो को याद करा गई ....

hemant sharma said...

रवि, कुछ लोग इतना अच्छा लिखते हैं कि उनसे इर्ष्या होने लगती है और प्यार भी. तुम हमेशा से मेरी उसी सूची में शामिल हो. इसी तरह लिखते रहना, मैं आ रहा हूँ...प्यार.