Saturday, November 1, 2008

बारिश की आवाज़


बारिश की कई आवाज़ें मेरी स्मृति में बजती रहती हैं। नदी और झरने की नहीं, सिर्फ बारिश की आवाज़। और बारिशों की इतनी आवाज़ें थीं कि जब बारिश नहीं हो रही होती है तब भी मुझे बारिश की आवाज़ सुनाई देती रहती है। जैसे ही मां हम भाई-बहनों को आवाज़ लगाती, मुझे लगता मां की आवाज़ के पीछे बारिश हो रही है। हम मां के पास दौड़ते हुए जाते। पहले मां हमारे सिर पर धीरे से हाथ फेरती, फिर चूमती और हमारी इधर-उधर पड़ी कॉपी-किताबों को अपने आंचल में से ऐसे निकालकर देतीं जैसे कॉपी-किताबें खरगोश के बच्चे हों। फिर कहती-बेटा अपनी कॉपी-किताबें संभाल कर रखा करो।
मां बहुत धीरे बोलती थी। इतना धीरे कि कान देकर सुनना पड़ता था। पहली बार में तो हमें सुनाई ही नहीं देता था कि मां क्या कह रही हैं। हम क्या मां क्या मां करते तो बड़ी मुश्किल से वह दुबारा अपनी बात कहती। लेकिन दुबारा वह कहती तो वह इतनी टूटी-फूटी होती कि हम समझ ही नहीं पाते। मुझे लगता मां की यह आवाज़ बारिश के कई परदों को पार करती हुई, लड़खड़ाती हम तक आ रही है। छप छप करती हुई।
बारिश में पिता के घर आने की आवाज भी अजीब थी। पिता को पैदल चलने की आदत थी। घनघोर बारिश में भी वे टेम्पो या रिक्शा में नहीं बैठते। वे जब घर आते तो उनके जूतों में पानी भरा होता और चलने पर उन जूतों से पचर-पचर की आवाज़ें आतीं। वे जूते निकालते तो बारिश के गंदले पानी की छोटी-सी धार की आवाज होती।
मां पहले से ही पंछा लेकर बैठी रहती। पिता सिर पोंछते तो बल्ब की पीली रोशनी में उनके सफेद बाल सुनहरी लगते और कनपटी पर पानी की बूंदें थोड़ी देर ठहरी रहतीं और फिर एक साथ इकट्ठा होकर फिसल जातीं।
घर में आते ही पिता पहले छत को देखते। छत पर बौछारों की आवाज के साथ बिल्ली की म्याऊं की लंबी आवाज सुनाई देती। छत के बाद पिता की आंखें घर की दीवारों पर फिसलने लगतीं। दीवारों में जहां सीलन आती वहां विचित्र आकृतियां उभर आतीं। हम भाई-बहन उन आकृतियों में शेर, हाथी, घोड़े, भालू, ढूंढ़ लेते। कई बार लगता दीवारों से बहुत धीमा शोर उठ रहा है। लगता, कोई चीख रहा है, चिल्ला रहा है। कभी कभी हमें घोड़ों के टापों की आवाज आती और दीवारों पर उभरी आकृतियों में लगता तलवार लिए लोग चीख-चिल्ला रहे हैं।
बारिश में कभी ऐसा भी होता कि दीवार पर एक बड़ी मानव मुखाकृति बन जाती। गौर से देखने पर भी पता नहीं लगता कि यह आकृति आदमी की है या औरत की। कभी-कभार हम भाई-बहन बहुत करीब से उसे देखते। वह मुखाकृति कभी हमें मां की लगती, कभी पिता की। रात मे कई बार हम भाई-बहन पीली रोशनी में इस काली-भूरी और कभी बदरंग दिखाई देती मुखाकृति को देख डर जाते। कई बार ऐसा होता कि रात में हड़बड़ाकर हम उठ बैठते और रोने लगते। मां हमें अपनी छाती से चिपटा लेती। हम धड़क-धड़क की आवाज सुनते। मां के छाती से चिपटा लेने के बावजूद हमारा डर कम नहीं होता।
पिता हमें धीरे-धीरे थपकियां देने लगते-थप् थप् थप्...
थपकियों के बीच हमें मां के गिलास भरने की आवाज सुनाई देती और फिर मां हमें धीरे से उठाकर कहती-ले पानी पी ले एक घूंट। मैं उठता और गट गट पानी पी जाता। नींद आने के ठीक पहले मुझे ऐसा लगता कोई सिसकियां ले रहा है। जोर-जोर से सांस लेने की आवाज आती। आंखें बंद किए मैं डरता रहता।
मुझे लगता दीवार पर बनी मुखाकृति रो रही है...

(लघु पत्रिका आवेग में प्रकाशित मेरी कहानी बारिश की आवाज का एक टुकड़ा। बहुत जल्द ही आप इस कहानी के दो और टुकड़े पढ़ पाएंगे। )
पेंटिंग - रवींद्र व्यास

12 comments:

Vidhu said...

बारिश की नीम ठंडक सी लिए कहानी के शब्द चित्र मन को सुकून देतें हैं अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा,

शायदा said...

बारिश का ये रंग निराला है। बचपन बारिश और इन सारे रंगों को आपने बेहतरीन ढंग से पिरोया है। पढ़कर एकबारगी अपने बचपन की बारिशों की याद आ जाती है। अगली कडि़यों की प्रतीक्षा है।

Parul said...

agli baarish ka intzaar....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बारिश के बरसने सा एहसास है इसके हर लफ्ज़ में ..बचपन क्या अभी भी बारिश बहुत पसंद है .अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा

फ़िरदौस ख़ान said...

अच्छी तहरीर है... बारिश के क्या कहने...

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा । अगली कडी का इंतजार रहेगा।

सतीश पंचम said...

रोचक...अच्छी पोस्ट।

शिरीष कुमार मौर्य said...

बहुत अच्छा गद्य है रवीन्द्र भाई।
बहुत भावप्रणव
- भावप्रवण होना कहानी के इस तकनीकी युग में अपराध है!

महेन said...

बारिश की आवाज़? बारिश का संगीत।

शिरीष की अंतिम बात से इत्तेफ़ाक रखता हूँ।

Pratyaksha said...

पानी की तरह बहे ..आपके शब्द ..भाव

एस. बी. सिंह said...

बचपन की बारिश के साथ एक रंग यह भी याद आया -

गुनगुनाती हुई गिरती हैं फलक से बूँदें
कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है।

अगली कड़ी की प्रतीक्षा में ..

bahadur patel said...

achchha hai. kahani pahale bhi padh chuka hoon.