Thursday, January 22, 2009

कैनवास के कारोबार का काला कारनामा!


अपने खूबसूरत रंगों से दुनिया को रोशन करती कला की दुनिया की यह एक काली खबर है। यह कला जगत के उजले रंगों पर कालिख है। 20 जनवरी को नईदुनिया के पहले पेज पर विशेष खबर पढ़कर इंदौर का चित्रकार-जगत स्तब्ध है। वे मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रजा के साथ हुई धोखाधड़ी से तो व्यथित हैं ही, इस बात से भी दुःखी हैं कि इसमें इंदौर के एक चित्रकार परवेज अहमद का नाम भी सामने आया है। नईदुनिया ने 20 जनवरी को भाषा सिंह की विशेष खबर छापी थी-अपनों से ही ठगे गए मशहूर चित्रकार रजा। इसी खबर को लेकर इंदौर के अधिकांश चित्रकारों का मानना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। कुछ ने इनके कारणों का जानने की कोशिश की है और कुछ सवाल उठाते हैं कि आज व्यापार का दर्शन ही कला का दर्शन हो गया है।
वरिष्ठ चित्रकार श्रेणिक जैन का कहना है कि इस तरह के फ्राड लंबे समय से चल रहे हैं। इसके पहले भी एमएफ हुसैन के चित्रों की नकल कर बेचने की कोशिशें हुईं हैं। एक तरफ तो कुछ लोगों ने रजा साहब की नजदीकियों का गलत फायदा उठाया है और दूसरी तरफ यह जानकार और दुःख हुआ कि इसमें हमारे शहर का चित्रकार शामिल है। चित्रकार-मूर्तिकार संतोष जड़िया इसके कारणों की पड़ताल करते हुए कहते हैं कि दिल्ली में हजारों चित्रकार हैं और सबकी पेंटिंग्स तो अच्छी कीमतों में नहीं बिकतीं। इसलिए कुछ चित्रकार मशहूर पेंटिंग्स की नकल करने के धंधे में लगे हुए हैं। वे कहते हैं - दिल्ली में इस तरह की नकल का काम बड़े स्तर पर होता रहा है। वहां नकली पेंटिंग्स का अच्छा-खासा धंधा होता है लेकिन जो गलत है, वह गलत है। इसके खिलाफ तो कार्रवाई होना चाहिए। जबकि वरिष्ठ चित्रकार मिर्जा ईस्माइल बेग का मानना है कि यह सब बाजार की ताकत है और दुर्भाग्यपूर्ण है।
ख्यात चित्रकार ईश्वरी रावल कहते हैं कि यह तो एक खूबसूरत छतनार के पेड़ को जड़ से काटने की कोशिश है। उनकी पेंटिंग्स की नकल करना धोखाधड़ी है और इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। वे सुझाव देते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में किसी चित्रकार के साथ इस तरह की धोखाधड़ी न हो। अमूर्त चित्रकार हरेंद्र शाह भी इस खबर को पढ़कर हैरान और दुःखी हैं। उनका मानना है कि रजा जैसे नामी -गिरामी चित्रकार की कलाकृतियों के साथ यह हरकत शर्मनाक है। और इसमें इंदौर के चित्रकार का नाम आना तो इंदौर के समूचे कला जगत के लिए आघात है। चित्रकार सुशीला बोदड़े तो इतनी दुःखी हैं कि कहती हैं चोर चोरी से जाए हेराफेरी से न जाए। रजा साहब के साथ हुई धोखाधड़ी की तो जांच होना चाहिए ताकि किसी और चित्रकार के साथ फिर कभी धोखाधड़ी न हो। जबकि चित्रकार अनीस नियाजी का कहना था कि इस पूरे मामले में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
बाजार में सिग्नेचर बिकती है
समकालीन भारतीय चित्रकारों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम है और उनकी कलाकृतियों की कीमतें करोड़ों में आंकी जा रही हैं। एमएफ हुसैन से लेकर एचएस रजा और तैयब मेहता से लेकर रामकुमार की कलाकृतियां लाखों डॉलर्स में बिक रही हैं। जाहिर है कला के फलते-फूलते बाजार में इनकी सिग्नेचर बिकती है। यही कारण है कि इन कलाकारों की कलाकृतियों की नकलें होती हैं। भोपाल में बस चुके इंदौर के चित्रकार अखिलेश कहते हैं कि इस ताजा मामले में इंदौर के चित्रकार ने तो नाम डुबाया ही है लेकिन इसमें गैलरी भी उतनी ही जिम्मेदार है क्योंकि उसने इतने बडे चित्रकार की उन पेंटिंग्स की असलियत पर कोई सवाल नहीं खड़े किए या पूरी तहकीकात नहीं की कि ये असल में रजा कि पेंटिंग्स है या नहीं। यह गैलरी पहले भी विवादों में रही है और यह सबसे पुरानी गैलरी है जिसने यह काम किया है। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है।
व्यापार का दर्शन ही कला का दर्शन
ख्यात चित्रकार प्रभु जोशी इस मामले को दूसरी निगाह से देखते हैं। उनका कहना है कि आज व्यापार का दर्शन ही कला का दर्शन हो गया है। इस मामले में निर्णायक सच तो कलाकार ही बताएगा और इतिहास की छलनी आखिरकार सच को भी छान देगी। आज कला का रिश्ता रसिक समाज से नहीं रह गया है। अब तो उसका रिश्ता व्यावसायिक सांस्थानिकता से विकसित हो चुका है। ऐसे में इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और सुर्खियां बनती रहेंगी। वे कहते हैं- आज बहस या विचार कला और उसके मूल्यों पर नहीं, इस बात पर होती है कि कौन-सा कलाकार कहां और कितनी ऊंची कीमत पर बिका है और उसे किस गैलरी ने बेचा है और किस ने उसे खरीदा है। जब कला के केंद्र में इस तरह की बातें होंगी तो फिर कला गौण होकर उसका बाजार ही हावी होगा।
कलाकृतियां रजिस्टर्ड हों
इंदौर की रिफ्लेक्शंस आर्ट गैलरी के संचालक सुमित रावत भी इस खबर से स्तब्ध हैं। वे कहते हैं यह दुःखद घटना है लेकिन इसके साथ ही वे एक व्यावहारिक सुझाव भी देते हैं। उनका कहना है कि इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए एक ऐसी अॉटोनॉमस बॉडी गठित की जाना चाहिए जो कलाकृतियों को बेचने-खरीदने के कामकाज को व्यवस्थित और विश्वसनीय बना सके। इसमें होना यह चाहिए कि हर युवा या वरिष्ठ कलाकार अपनी कलाकृति को रजिस्टर्ड करवाए और अपनी कलाकृति की इमेज के साथ उसके बारे में तमाम जानकारियां दें जिसमें साइज, मीडियम, कीमत आदि की जानकारी हो। इससे चित्रकार, कला प्रेमी या खरीदार और गैलरी सबका फायदा है और किसी भी तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सकेगा।
रजा के नकली चित्रों की प्रदर्शनी में मेरी कोई भूमिका नहीं
इंदौर के चित्रकार परवेज एहमद का कहना है कि दिल्ली की धूमिमल आर्ट गैलरी में मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रजा के नकली चित्रों की प्रदर्शनी में उनकी कोई भूमिका नहीं है। उन्हें इसकी खबर तक नहीं है कि रजा के ये तथाकथित चित्र कहां से और किन लोगों से इकट्ठा किए गए थे। इस विवाद में उनका नाम आने से वे दुःखी हैं। उल्लेखनीय है कि शनिवार को जब इस प्रदर्शनी का उद्घाटन करने चित्रकार रजा आए तो उन्होंने प्रदर्शित चित्रों को देखकर कहा कि ये चित्र उनके नहीं हैं। इस मौके पर विवाद हुआ और रजा की आपत्ति पर गैलरी के संचालक को यह प्रदर्शनी घंटेभर में तुरंत हटा देना पड़ी। दिल्ली से बुधवार को ही लौटे श्री एहमद ने नईदुनिया को बताया कि मैं तीस सालों से रजा साहब को जानता हूं और वे भी मुझे बेहतर जानते हैं। उन्होंने 2007 और 2008 में इसी गैलरी में हुई मेरी प्रदर्शनी के लिए कैटलॉग लिखा था। उनका कहना है कि रजा के भांजे जेडएच जाफरी को उन्होंने गैलरी की संचालक से 2007 मिलवाया था। उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि इस प्रदर्शनी की योजना कब बनी और कैसे बनी। वे कहते हैं कि मुझे इस बात का भी पता नहीं कि रजा के भांजे जाफरी ने ये चित्र कहां से एकत्रित किए। वे यह भी कहते हैं कि गैलरी की संचालन उमा रवि जैन खुद यह स्वीकार करती हैं कि ये सब चित्र श्री जाफरी ने उपलब्ध कराए। इसमें मैं कहीं से कहीं तक नहीं हूं। वे यह भी कहते हैं कि गैलरी की संचालक ने घोषित किया था कि प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्र बिक्री के लिए नहीं हैं। शनिवार को इस प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिए श्री जाफरी ही रजा साहब को लेकर आए थे। श्री एहमद कहते हैं कि सोमवार को भी मैं गैलरी गया पत्रकारों को इस विवाद के मद्देनजर वस्तुस्थिति बता सकूं। वे यह भी कहते हैं कि मुझे तो इस प्रदर्शनी के बारे में तब पता चला जब गैलरी से मुझे कार्ड मिला। रजा साहब मेरे तब से प्रशंसक है जब 78-79 में इंदौर में फाइन आर्ट कालेज की वार्षिक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने वे आए थे। इसमें मेरी एक पेटिंग को उन्होंने सराहा था। मुझे तो यह समझ ही नहीं आ रहा है कि इसमें मेरा नाम क्यों और कैसे उछाला गया।
(सैयद हैदर रजा की पेंटिंग गूगल से साभार)

6 comments:

विनय said...

बहुत अच्छे




---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

Abhishek said...

Gambhir vishay uthaya hai apne.

संगीता पुरी said...

दुर्भाग्यपूर्ण है....कलाकारों को सहायता मिलनी चाहिए।

एस. बी. सिंह said...

भाई कैनवास पर ही नहीं असल दुनिया में भी सफ़ेद के साथ साथ काले रंग की उपस्थिति है।

Bahadur Patel said...

bahut achchha likha aapane.
kala jagat is tarah ki ghatnayen bahut kharab hai.

Uttama said...

सही समस्या उठाई है आपने