Friday, January 9, 2009

कूदती-फांदती कुंवारी कन्या का कल्लोल !


नर्मदा! तुम सुंदर हो, अत्यंत सुंदर, अपने सौंदर्य का थोड़ा-सा प्रसाद मुझे दो ताकि मैं उसे दूसरों तक पहुंचा सकूं। -अमृतलाल वेगड़
धाराजी की धार्मिक धाक है। वहां श्रद्धालु डुबकी लगाने जाते हैं। कहते हैं पुण्य मिलता है। शहर के चित्रकार- फोटोग्राफर पंकज अग्रवाल भी डुबकी लगाने गए थे लेकिन यह कलात्मक डुबकी थी। उन्होंने कैमरा हाथ में लेकर डुबकी लगाई। यानी यहां की सुंदरता में डूबकर तस्वीरें लीं। डुबकी से मिले पुण्य में उन्हें कुछ छवियां मिली, कुछ बिम्ब मिले। कुछ रंग मिले, कुछ आकार। धीमी बहती लयात्मक गतियां और तेज उछलती, चांदी सी चमकती लहरें मिली। धूप में किसी स्त्री की तरह लेटीं और अपनी ही सुंदरता पर प्रसन्न-मुग्ध, आड़ी-खड़ी, रंग-बिरंगी चट्टानें मिलीं। छांव मिली और धूप मिली, उसमें नर्मदा की कूदती-फांदती सुंदरता मिली। उन्होंने अपनी नाजुक निगाह से इन्हें संजो लिया। और नाम दे दिया-अवगाहन यानी डुबकी लगाना। ये धाराजी के कलात्मक व चित्रमय दस्तावेज। अपने इन चित्रों को वे पहली बार प्रदर्शित कर रहे हैं।
उनके लगभग चालीस फोटो की प्रदर्शनी भारत-भवन में 13 से 18 जनवरी तक लगेगी। भारत-भवन के रूपंकर की रूपाभ श्रृंखला की यह ताजा कड़ी है। जाहिर है इस बार वे कूची और कलर्स के साथ नहीं, कैमरे के कमाल के साथ हाजिर हैं। पंकजजी कहते हैं-मैंने अोंकारेश्वर, महेश्वर, धाराजी और मझधार के कई चक्कर लगाए हैं। हमेशा नर्मदा और उसके आसपास बिखरे सौंदर्य से अभिभूत रहा हूं। जब पता लगा कि डेम में धाराजी का सौंदर्य डूब जाएगा तो मैंने इसे कैमरे में कैद कर लिया। नर्मदा चिर कुंवारी है। इसे रेवा भी कहा गया है यानी कूदती-फांदती। पंकजजी ने इस कुदती-फांदती कुंवारी कन्या के कल्लोल के मुग्धकारी फोटो लिए हैं। इसमें नर्मदा चट्टानों पर, उनके बीच से, दर्रे और खोह में से इठलाती-मचलती दिखाई देती है। वह कभी एक कुंड में अंधेरे में काली है तो दूसरे कुंड में कूदती हुई रोशनी में अपने हरेपन में मोहित करती है। कभी किसी झरने में अपनी सफेद पवित्रता में, कभी अपने गुनगुनाते ऐश्वर्य में इन फोटो में वह मन को शीतल करती है।
पंकजजी ने उसकी लय, रंगत और बलखाते अंदाज को संवेदनशील और कल्पनाशील तरीके से कैद किया है। उनके फोटो में वे चट्टानें भी हैं जो इसके प्रवाहमान स्पर्श से सुघड़ आकार हासिल करती हैं। इनकी कभी खुरदुरी और कभी चिकनी सतह पर इस भागती-दौड़ती कन्या के पांवों के खूबसूरत निशान नए नए रूपाकार बनाते हैं और पंकजजी ने इन्हें सूरज की मुलायम रोशनी में एक संतुलित संयोजन में संजो लिया है। वे एक ही फ्रेम में नर्मदा की अल्हड़ता, सुंदरता, खूबसूरत चट्टान, उसकी गोलाइयों, मोड़ों और उन पर बनी अनोखी-अनूठी रेखाअों को एक साथ देख-दिखा पाते हैं। यह उनका कलात्मक धैर्य है। वे कहते हैं कि इस नदी का सौंदर्य उन कुंडों और चट्टानों में भी देखा जा सकता है कि कैसे उसने अपने बहने से उन्हें एक कलाकृति में बदल दिया है। कत्थई, लाल-भूरी और स्लेटी चट्टानों पर नर्मदा की अनेक कलाकृतियां हैं। नर्मदा ने अपनी चट्टानों को लयात्मक आकार दे दिए हैं जैसे ये मूर्तिशिल्प हों। उनके एक चित्र में एक पूरी चट्टान का फोटो इतना सुंदर है कि लगता है कि कोई स्त्री लेटी हुई धूप सेंक रही है। उनके चित्रों में नर्मदा के आईने में आसमान भी झांकता दिखाई दे जाएगा और कोई पत्थर किसी जलीय जीव की तरह। वे कहते हैं कि अब हमारी आंख इन नजारों को नहीं देख पाएगी। इन नजारों में मनोहारी रंग है, पानी के बहाव हैं, चट्टान के रंग और आकार हैं और ये सब मिलकर लयात्मकता का अद्भुत संसार बनाते हैं। पंकजजी कहते हैं कि हम मानते हैं कि ईश्वर प्रकृति है तो क्या हम ईश्वर को ही नहीं मिटा रहे हैं? पंकजजी नर्मदा के सौंदर्य-वैभव का यह चित्रमय प्रसाद लाए हैं। वे मां नर्मदा को प्रणाम करते हैं, हम उनके इस दस्तावेजी और कलात्मक काम के लिए उन्हें सलाम करते हैं।

10 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

वैसे अगर दिल्ली में होती तो अवश्य आते। हो सके अगली पोस्ट में कुछ फोटो और लगा देना और आँखो देखा हाल सुना देना। आपकी आँखो से ही देख लेंगे।

Vidhu said...

माँ नर्मदा के सुंदर शब्द भिव्यक्ति दवारा दरसन हेतु धन्यवाद achchaa लिखा आपने, चित्र प्रदर्शनी देखने जरूर जाउंगी ....सूचना के लिए आभार

sareetha said...

नर्मदा का सैंदर्य अलौकिक और बेजोड है । आपने शब्दों की रुपरेखा से इसका बखूबी आवर्धन किया, खूबसूरती से ...। बेहद खूबसूरत ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुँदर तस्वीरेँ हैँ माँ नर्मदे हर नर्मदे
- लावण्या

कुमार अम्‍बुज said...

पिछली तीनों पोस्‍ट इसलिए भी अच्‍छी हैं कि वे कला की पहचान करती हैं, उनसे संवाद करने का प्रयत्‍न हैं और पढ़नेवाले का भी विस्‍तार करती हैं। तुम्‍हें इसी सबमें अपने को गर्क करना चाहिए। शुभकामनाएं।

Parul said...

सांवले मेघ,सागर की लहरें,नदी का उफ़ान…इनकी पल पल बनती बिगड़ती आकृतियाँ …घंटो निःशब्द निहारी जा सकती हैं

shelley said...

achchha blog hai aapka. blog me pahli baar narmada maiya ko dekha. lekh achchha hai. par chitra se main sahmat nahi hu. shirshak se v chitra koi nata nahi hai. is post me narmda k diby swrup k kuch chira jod den.

एस. बी. सिंह said...
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एस. बी. सिंह said...

सुंदर आलेख। रविन्द्र भाई प्रसंग बस एक लोककथा याद आ गयी। नर्मदा और सोन दो नदियाँ एक ही उद्गमस्थल अमरकंटक से निकलती है पर एक पश्चिम-दक्षिण की और बहती है तो दूसरी विपरीत दिशा पूर्व-दक्षिण की और। प्राचीन साहित्य में सोन को नदी नहीं पुलिंग नद (सोनभद्र) माना जाता है।( ब्रह्मपुत्र को भी नद कहते हैं)। कथा है की कभी सोन ने नर्मदा का प्रणय निवेदन ठुकरा दिया था जिससे दुखी नर्मदा विपरीत दिशा में बह चलीं और आजीवन कुवांरी रहीं। नर्मदा ने क्रोधित हो सोन को शाप दिया जिसके के कारण सोन की पूजा नहीं होती।

Bahadur Patel said...

bahut achchha varanan hai.
pradarshani dekhana apane aap me adbhut hoga.dekhane nahin ja payenge isaka khed hai.
chunki main dewas ka hi hoon aur dharaji dewas jile me hi sthit thi. ab bandh banane se vahan pani bhar gaya hai. dharaji ka soundrya nasht ho gaya hai.
bandh se pedon ki andhadhundh katai hui hai.prakriti ka bada nukasan huya aur hamari kai dharoharen nasht hui hain.
yah bhi gambhir mudda hai jisaka ullekh hame har jagah kiya jana chahiye. baba aamte, medha patkar, aalok agrawal, silvi, arundhati rai aadi ne bahut pahal ki hai. aandolan bhi kiye.lekin sarkaren chahe vah kendra ki ho ya rajya ki ho apani manmani se baaj nahin aayi.
naveen sagar ne apani kavita me kaha hai ki- yah ek yesi sarkar hai jisake ek haath me sitaar aur doosare me hathiyar hai.
ravindra bhai ambuj ji sahi kah rahe hai.